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चंद्रयान-2 मिशन जानकारी

भारतीय उद्देश्य और वैश्विक महत्वाकांक्षाएं

चंद्रयान – 2 मिशन अब तक के मिशनों से भिन्न है। करीब दस वर्ष के वैज्ञानिक अनुसंधान और अभियान्त्रिकी विकास के कामयाब दौर के बाद भेजे जा रहे, भारत के दूसरे चंद्र अभियान से चंद्रमा के दक्षिण ध्रुवीय क्षेत्र के अब तक के अछूते भाग के बारे में जानकारी मिलेगी। इस मिशन से व्यापक भौगौलिक, मौसम सम्बन्धी अध्ययन और चंद्रयान 1 द्वारा खोजे गए खनिजों का विश्लेषण करके चंद्रमा के अस्तित्त्व में आने और उसके क्रमिक विकास की और ज़्यादा जानकारी मिल पायेगी। इसके चंद्रमा पर रहने के दौरान हम चाँद की सतह पर अनेक और परिक्षण भी करेंगे जिनमें चाँद पर पानी होने की पुष्टि और वहां अनूठी रासायनिक संरचना वाली नई किस्म की चट्टानों का विश्लेषण शामिल हैं।

अंतरिक्ष में भारत की मौजूदगी

वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और खोजी वैज्ञानिकों की नई पीढ़ी को प्रोत्साहन देना

अंतर्राष्ट्रीय अपेक्षाओं से भी ज़्यादा सफलता प्राप्त करना

चंद्रयान 2 श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से 9 से 16 जुलाई 2019 के बीच जीएसएलवी एमके- III से अंतरिक्ष में छोड़ा जायेगा। इसे पृथ्वी की 170x39120 किलोमीटर की कक्षा में स्थापित किया जाएगा। इस्ला ऑर्बिट (कक्षा) उठाने और ल्यूनर ट्रांसफर ट्रेजेक्टरी में स्थापित कराने के प्रयास किए जायेंगे। चंद्रमा के आभामंडल में प्रवेश के बाद यान में लगे थ्रस्टर्स उसकी गति को धीमा कर देंगे ताकि चाँद के चित्र लिए जा सकें। चंद्रमा के गिर्द चंद्रयान 2 की कक्षा भी 100x100 किलोमीटर के घेरे में रखने के वैज्ञानिक प्रयास किए जाएंगे। लैंडिंग के दिन, कक्षा में किए जाने वाले प्रयासों से लैंडर ऑर्बिटर से अलग हो जाएगा और फिर रफ ब्रेकिंग तथा फाइन ब्रेकिंग जैसी क्रियाएं की जाएँगी। उतरने से पहले चाँद की सतह के फोटो लेने के लिए सुरक्षित और बाधारहित क्षेत्र चुने जाएंगे। लैंडर- विक्रम 6 सितंबर 2019 को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास लैंड करेगा। इसके बाद, रोवर चन्द्रमा की सतह पर घूमेगा और चाँद के एक दिन की अवधी यानी पृथ्वी के 14 दिन की अवधी तक परिक्षण जारी रखेगा। ऑर्बिटर मिशन एक वर्ष तक जारी रहेगा।

वैज्ञानिक परीक्षण

चंद्रयान - 2 से चाँद की भौगोलिक संरचना, भूकम्पीय स्थिति, खनिजों की मौजूदगी और उनके वितरण का पता लगाने, सतह की रासायनिक संरचना, ऊपर मिटटी की ताप भौतिकी विशेषताओं का अध्ययन करके चन्द्रमा के अस्तित्व में आने तथा उसके क्रमिक विकास के बारे में नई जानकारियां मिल सकेंगी।

ऑर्बिटर पे-लोड 100 किलोमीटर दूर की कक्षा से रिमोट सेंसिंग अध्ययन करेगा जबकि लैंडर और रोवर पे-लोड लैंडिंग साइट के नज़दीक इन - सिटु आंकड़े एकत्र करेगा।


 

चन्द्रमा की संरचना समझने के लिए वहां की सतह में मौजूद तत्वों का पता लगाने और उनके वितरण के बारे में जाने के लिए व्यापक स्तर पर और इन - सिटु स्वर पर परीक्षण किये जायेंगे। साथ ही चन्द्रमा के चट्टानी क्षेत्र "रेगोलिथ" की विस्तृत 3-डी मैपिंग की जाएगी। चन्द्रमा के आयनमंडल में इलेक्ट्रान घनत्व (डेंसिटी) और सतह के पास प्लाज़्मा वातावरण का भी अध्ययन किया जायेगा। चन्द्रमा की सतह के ताप भौतिकी गुणों (विशेषताओं) और वहां की भूकम्पीय गतिविधियों को भी मापा जाएगा। इंफ़्रा रेड स्पेक्ट्रोस्कोपी, सिंथेटिक अपर्चर रेडियोमीट्री और पोलरीमिट्री की सहायता से और व्यापक स्पेक्ट्रोस्कोपी तकनीकों से चाँद पर पानी की मौजूदगी के ज़्यादा से ज़्यादा आंकड़े इकठ्ठा किए जायेंगे।

मुख्‍य-पेलोड

चंद्रयान 2 विस्तृत क्षेत्र सॉफ्ट एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर

चंद्रमा की मौलिक रचना

इमेजिंग आई आर स्पेक्ट्रोमीटर

मिनरेलॉजी मैपिंग और जल तथा बर्फ होने की पुष्टि

सिंथेटिक एपर्चर रडार एल एंड एस बैंड

ध्रुवीय क्षेत्र मानचित्रण और उप-सतही जल और बर्फ की पुष्टि

ऑर्बिटर हाई रेजोल्यूशन कैमरा

हाई-रेज टोपोग्राफी मैपिंग

चंद्रमा की सतह थर्मो-फिजिकल तापभौतिकी प्रयोग

तापीय चालकता और तापमान का उतार-चढ़ाव मापना

अल्फा कण एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर और लेजर चालित ब्रेकडाउन स्पेक्ट्रोस्कोप

लैंडिंग साइट के आसपास मौजूद तत्‍वों और खनिजों की मात्रा का विश्‍लेषण

भूस्थिर प्रक्षेपण यान मार्क - III (जी एस एल वी एम के III)

जीएसएलवी एमके- III चंद्रयान 2 को इसकी निर्धारित कक्षा में ले जाएगा। यह भारत का तीन चरणों वाला अब तक का सबसे शक्तिशाली लांचर है और यह 4 टन के उपग्रहों को जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (जीटीओ) में लॉन्च करने में सक्षम है।

इसके घटक हैं:

एस 200 सॉलिड रॉकेट बूस्टर

एल 110 तरल चरण

सी 25 ऊपरी चरण

चन्द्रयान -1 का इतिहास

15 अगस्त, 2003: तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा चंद्रयान कार्यक्रम की घोषणा की गई

22 अक्टूबर, 2008: श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से चंद्रयान-1 का प्रक्षेपण

8 नवंबर, 2008: चंद्रयान-1 ने चन्द्रमा की ट्रांसफर ट्रेजेक्टरी में प्रवेश किया

14 नवंबर, 2008: चंद्रयान 1 से सतह की जांच करने वाला उपकरण बाहर निकालता है और चन्द्रमा के दक्षिण ध्रुव के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जांच से चंद्रमा की सतह पर पानी के अणुओं की उपस्थिति की पुष्टि हुई

28 अगस्त, 2009: चंद्रयान-1 कार्यक्रम की समाप्ति