WEBVTT

00:23.060 --> 00:25.660
योग आवश्यक रूप से एक आध्यात्मिक

00:25.660 --> 00:26.500
अनुशासन है,

00:26.500 --> 00:28.600
जो विशेषतः परिस्कृत विज्ञान

00:28.600 --> 00:29.750
पर आधारित है।

00:29.750 --> 00:31.490
यह स्वस्थ जीवन के लिए

00:31.490 --> 00:33.220
एक कला और विज्ञान है।

00:34.840 --> 00:36.940
योग शब्द की उत्पत्ति संस्कृत

00:36.940 --> 00:38.860
के शब्द युग से हुई है,

00:38.860 --> 00:41.070
जिसका अर्थ जुड़ने या

00:41.070 --> 00:42.220
एक जुट होने से है।

00:46.190 --> 00:48.390
यौगिक लेखों के आधार पर योग का

00:48.390 --> 00:50.270
अभ्यास व्यक्तिगत चेतना को

00:50.270 --> 00:52.360
सार्वभौमिक चेतना के साथ मिलन

00:52.360 --> 00:54.010
करने के लिए अग्रसर करता है,

00:59.290 --> 01:02.220
जिससे मन और शरीर तथा मनुष्य और

01:02.220 --> 01:04.200
प्रकृति के बीच एक बेहतर

01:04.200 --> 01:05.190
संतुलन बना रहे।

01:10.180 --> 01:11.860
योग्य के विज्ञान की उत्पत्ति

01:11.860 --> 01:13.280
हज़ारों वर्ष पूर्व

01:14.920 --> 01:16.560
धर्म व विश्वास की पहली

01:16.560 --> 01:18.010
व्यवस्थाओं के जन्म से

01:18.010 --> 01:19.770
भी पहले हुई थी।

01:19.770 --> 01:22.940
यौगिक लेखों के आधार पर शिव,

01:22.940 --> 01:26.010
जो कि पहले योगी या आदि योगी थे,

01:26.010 --> 01:29.240
उन्होंने अपने गहन ज्ञान को अपने

01:29.240 --> 01:32.330
7 शिष्यों प्रसिद्ध सप्तऋषियों या

01:32.330 --> 01:34.280
7 मनिषियों के बीच प्रसारित

01:34.280 --> 01:34.680
किया था।

01:39.520 --> 01:41.730
योग को पूर्व वैदिक काल से ही

01:41.730 --> 01:43.660
अभ्यास में लिया जाता रहा है।

01:43.660 --> 01:45.340
लेकिन महर्षि पतंजलि,

01:45.340 --> 01:47.100
जिन्हें आधुनिक योग के पिता

01:47.100 --> 01:48.510
के रूप में माना जाता है,

01:48.510 --> 01:49.980
वही पहले व्यक्ति थे,

01:49.980 --> 01:51.890
जिन्होंने उस स समय के अभ्यासों

01:51.890 --> 01:54.060
को अपने योग सूत्रों के आधार पर

01:54.060 --> 01:56.710
सुव्यवस्थित और समिता बद्ध किया।

01:56.710 --> 01:59.250
बाद में अनेक योग गुरुओं ने इस

01:59.250 --> 02:01.170
विद्या के संरक्षण और विकास के

02:01.170 --> 02:03.740
लिए अपना योगदान दिया और इस

02:03.740 --> 02:06.160
आश्चर्य जनक अभ्यास को फैलाया।

02:06.160 --> 02:08.350
योग के विभिन्न विद्यालय हैं,

02:10.729 --> 02:12.700
जिनमें ज्ञान योग,

02:12.700 --> 02:14.295
भक्ति योग,

02:14.295 --> 02:18.100
कर्मयोग पातंजल योग,

02:18.100 --> 02:19.860
हठ योग,

02:19.860 --> 02:21.750
कुंडलिनी योग,

02:21.750 --> 02:23.480
ध्यान योग,

02:23.480 --> 02:25.330
मंत्र योग,

02:25.330 --> 02:27.170
लय योग,

02:27.170 --> 02:28.940
जैन योग,

02:28.940 --> 02:31.620
बौद्ध योग आदि शामिल हैं।

02:33.480 --> 02:35.280
प्रत्येक विद्यालय की अपनी

02:35.280 --> 02:37.210
पद्धतियां और अभ्यास है,

02:37.210 --> 02:39.200
जो योग के मुख्य लक्ष्य और

02:39.200 --> 02:40.890
उद्देश्यों की ओर मार्ग

02:40.890 --> 02:42.210
दर्शन करती हैं।

02:42.210 --> 02:44.790
कुछ प्रमुख रूप से अभ्यास में लाई

02:44.790 --> 02:46.690
जाने वाली योग साधनाएं हैं

02:46.690 --> 02:47.160
यम,

02:49.780 --> 02:50.120
नियम,

02:53.240 --> 02:54.340
आसन,

02:54.340 --> 02:56.340
प्राणायाम,

02:56.340 --> 02:58.325
प्रत्याहरा,

02:58.325 --> 02:59.870
धारणा,

02:59.870 --> 03:01.380
ध्यान,

03:01.380 --> 03:02.920
समाधि,

03:02.920 --> 03:04.310
बंधा,

03:04.310 --> 03:05.860
मुद्रा,

03:05.860 --> 03:07.700
षठ-कर्म,

03:07.700 --> 03:09.420
युक्ताहार,

03:09.420 --> 03:13.050
मंत्र जाप, तथा युक्त कर्म।

03:14.590 --> 03:16.500
योग का अभ्यास करने वाले को

03:16.500 --> 03:19.260
योगाभ्यास करते समय यहाँ बताए जा

03:19.260 --> 03:21.160
रहे कुछ निर्देशक सिद्धांतों

03:21.160 --> 03:22.780
का पालन करना चाहिए।

03:22.780 --> 03:26.400
अभ्यास से पूर्व योगाभ्यास शांति

03:26.400 --> 03:29.450
और आनंद के वातावरण में शांत शरीर

03:29.450 --> 03:31.870
और मस्तिष्क के साथ करना चाहिए।

03:31.870 --> 03:33.960
यह खाली पेट या हल्के

03:33.960 --> 03:35.400
पेट करना चाहिए।

03:35.400 --> 03:37.260
यदि आपको कमजोरी का

03:37.260 --> 03:38.220
अनुभव होता है,

03:38.220 --> 03:39.570
तो गुनगुने पानी में

03:39.570 --> 03:40.670
शहद मिला कर पी ले।

03:42.190 --> 03:44.330
शरीर की गतिविधियों की सहजता के

03:44.330 --> 03:47.340
लिए हल्के और आरामदायक सूती कपड़ों

03:47.340 --> 03:49.110
को प्राथमिकता देनी चाहिए।

03:49.110 --> 03:50.880
कोई पुरानी, बीमारी,

03:50.880 --> 03:53.530
दर्द या हृदय संबंधी समस्या होने

03:53.530 --> 03:56.030
पर योगाभ्यास करने से पहले किसी

03:56.030 --> 03:57.920
चिकित्सक या योग चिकित्सक

03:57.920 --> 03:59.490
से परामर्श अवश्य करें।

04:01.090 --> 04:03.770
अभ्यास के दौरान अभ्यास सत्र का

04:03.770 --> 04:05.770
प्रारंभ प्रार्थना या वंदना

04:05.770 --> 04:07.060
से किया जाना चाहिए,

04:07.060 --> 04:09.340
क्योंकि इससे मन की शांति के लिए

04:09.340 --> 04:11.980
एक सहायक वातावरण बनता है।

04:11.980 --> 04:15.290
योग अभ्यास, धीरे-धीरे, तनाव,

04:15.290 --> 04:17.959
मुक्त तरीके से शरीर और सांस की

04:17.959 --> 04:19.930
जागरूकता के साथ किए जाने चाहिए।

04:21.709 --> 04:23.350
सांस को तब तक न रोकें,

04:23.350 --> 04:25.710
जब तक ऐसा करने के लिए न कहा जाए।

04:28.460 --> 04:30.560
शरीर को कसा हुआ या झटके

04:30.560 --> 04:31.660
के साथ न रखें।

04:33.380 --> 04:35.090
अभ्यासों को अपनी क्षमताओं

04:35.090 --> 04:36.140
के अनुसार करें।

04:37.860 --> 04:39.290
सत्र का अंत गहन,

04:39.290 --> 04:41.300
मौन या शांति पाठ से करें।

04:43.700 --> 04:45.125
अभ्यास सत्र के 20,

04:45.125 --> 04:47.570
30 मिनटों के उपरांत ही भोजन

04:47.570 --> 04:49.280
या स्नान करना उचित होगा।

04:51.970 --> 04:53.060
योग की दुनिया में

04:53.060 --> 04:54.730
आपका स्वागत है।

04:54.730 --> 04:57.020
ज्ञान के इस अनोखे संसार

04:57.020 --> 04:58.720
में आपका स्वागत है।

04:58.720 --> 05:01.050
जैसा प्रासंगिक और लाभकारी।

05:01.050 --> 05:02.750
यह हजारों वर्ष पूर्व था,

05:02.750 --> 05:04.150
वैसा ही आज भी है।

05:14.582 --> 05:21.713
ॐ

05:22.663 --> 05:32.052
ॐ

05:34.133 --> 05:41.951
ॐ

05:44.970 --> 05:49.520
संगछध्वम संवदध्वं

05:49.520 --> 05:54.870
संगचध्वमसंगरधम

05:54.870 --> 05:59.230
संग मना सी जानता

06:01.440 --> 06:05.020
ंगो मना से जा लगा

06:06.840 --> 06:11.480
देवा भागं यथा पूरे

06:11.480 --> 06:17.070
देवा भागं यथा पूरे

06:17.070 --> 06:21.955
संजा नाना उपासते

06:21.955 --> 06:27.150
संझा ना ना उपासते

06:27.150 --> 06:31.370
संजा नाना उपासते

06:32.930 --> 06:36.710
संझा ना ना उपासते

06:38.310 --> 06:42.070
समझा ना ना उपासते

06:43.790 --> 06:47.410
संझा ना ना उपासते

06:54.580 --> 06:55.660
योग की दुनिया में

06:55.660 --> 06:57.290
आपका स्वागत है।

06:57.290 --> 06:59.710
आइये अब हम योग साधना

06:59.710 --> 07:01.110
का अभ्यास चालन,

07:01.110 --> 07:03.490
क्रियाओं यानि शिथिलता अभ्यासों

07:03.490 --> 07:04.460
से करते हैं,

07:04.460 --> 07:06.910
जो शरीर में सुकषब्रूपऐसी रक्त

07:06.910 --> 07:08.600
संचार को बढ़ाते हैं।

07:08.600 --> 07:11.220
गर्दन का व्यायाम गर्दन को

07:11.220 --> 07:13.490
आगे और पीछे झुकाना।

07:13.490 --> 07:16.110
सचेत मुद्रा में खड़े हो।

07:16.110 --> 07:18.460
पैरों को आरामदायक स्थिति में

07:18.460 --> 07:21.390
फैलाएं तथा हाथों को कमर पर रखें।

07:21.390 --> 07:24.500
सांस छोड़ें तथा सिर को धीरे धीरे

07:24.500 --> 07:27.320
आगे की ओर झुकाएं और थोड़ी को छाती

07:27.320 --> 07:29.430
से स्पर्श करने का प्रयास करें।

07:29.430 --> 07:32.070
सांस भीतर लें तथा सिर को उतना

07:32.070 --> 07:34.930
पीछे ले जाए जितना आराम से जा सके

07:34.930 --> 07:37.060
और सांस भीतर लिए हुए सिर

07:37.060 --> 07:38.490
को वापस आगे लाएं।

07:41.670 --> 07:43.360
गर्दन को बाहिनी तथा

07:43.360 --> 07:44.810
दाहिनी ओर झुकाना।

07:44.810 --> 07:47.130
सांस छोड़े तथा सिर को धीरे

07:47.130 --> 07:48.650
धीरे दाहिनी तरफ झुकाएँ।

07:48.650 --> 07:51.030
कान को कंधे के उतना अधिक निकट

07:51.030 --> 07:53.070
ले जाएं, जितना सम्भव हो।

07:53.070 --> 07:55.910
सांस भीतर लें तथा सिर को सामान्य

07:55.910 --> 07:56.940
स्थिति में लाएं।

07:56.940 --> 07:59.090
सांस छोड़े तथा सिर को

07:59.090 --> 08:00.650
बाईं तरफ झुकाएं।

08:00.650 --> 08:03.750
सांस भीतर लें तथा सिर को वापस

08:03.750 --> 08:05.550
सामान्य स्थिति में लाए।

08:05.550 --> 08:08.670
दाहिनी और बाहिनी और घुमाना।

08:08.670 --> 08:09.470
सांस,

08:09.470 --> 08:12.100
छोड़े तथा सिर आराम से दाहिनी तरफ

08:12.100 --> 08:14.300
इतना घुमाएँ की थोडी कंधे

08:14.300 --> 08:15.975
की सीध में आ जाए।

08:15.975 --> 08:18.900
सांस भीतर लें तथा सिर को वापस

08:18.900 --> 08:20.740
सामान्य स्थिति में लाएं।

08:20.740 --> 08:23.270
सांस छोड़ें तथा सिर को

08:23.270 --> 08:24.790
बाईं तरफ घुमाए।

08:24.790 --> 08:27.780
सांस भीतर लें तथा सिर को वापस

08:27.780 --> 08:28.980
सामान्य स्थिति में लाएं।

08:31.260 --> 08:32.840
गर्दन को घुमाना

08:32.840 --> 08:35.259
सिर को आगे की ओर झुकाकर।

08:35.260 --> 08:36.890
ठोड़ी को छाती से स्पर्श

08:36.890 --> 08:38.355
कराने का प्रयास करें।

08:38.355 --> 08:41.179
सांस भीतर लें तथा सिर को घड़ी की

08:41.179 --> 08:42.750
सुइयों की दिशा में घुमाएं।

08:42.750 --> 08:44.300
सिर नीचे की ओर जाते

08:44.300 --> 08:46.060
समय सांस छोड़ें।

08:46.060 --> 08:48.590
सिर को घड़ी की सुइयों की विपरीत

08:48.590 --> 08:49.670
दिशा में घुमाएं।

08:49.670 --> 08:51.930
गर्दन के चारों और खिंचाव,

08:51.930 --> 08:53.800
गर्दन के जोड़ों और मास,

08:53.800 --> 08:55.960
पेशियों के शिथिलन तथा गर्दन के

08:55.960 --> 08:57.340
तनाव के दूर होने की

08:57.340 --> 08:58.500
अनुभूति करें।

08:58.500 --> 09:00.770
गर्दन में दर्द और स्पोंडलाइटिस

09:00.770 --> 09:02.680
की शिकायत वाले लोगों को यह

09:02.680 --> 09:04.590
व्यायाम आराम से करना चाहिए।

09:08.110 --> 09:09.800
स्कंध संचालन

09:09.800 --> 09:12.580
दोनो पैर परस पर मिले हुए हो।

09:12.580 --> 09:15.190
पैर से सिर तक के हिस्से को सीधा

09:15.190 --> 09:18.050
रखे। भुजाओं को बगल में रखें।

09:18.050 --> 09:20.760
श्वास खींचते हुए बगल से दोनो

09:20.760 --> 09:23.610
बुझाओं को अपने सिर से ऊपर उठाए

09:23.610 --> 09:25.960
हथेलियां उर्ध्व दिशा में हो।

09:25.960 --> 09:28.450
श्वास छोड़ते हुए दोनों बुझाओ

09:28.450 --> 09:30.570
को बगल में वापस ले आये।

09:30.570 --> 09:33.510
जब हाथों को सिर से ऊपर उठाए तो

09:33.510 --> 09:35.350
ध्यान रखें कि वे सिर

09:35.350 --> 09:37.430
को स्पर्श न करें।

09:37.430 --> 09:41.070
इसी तरह जब हाथों को नीचे लेकर आए

09:41.070 --> 09:43.330
तो इस बात का ध्यान रखें की

09:43.330 --> 09:45.390
जांघों को वे स्पर्श न करें।

09:47.530 --> 09:49.640
उंगलियों को मिलाते हुए दोनों

09:49.640 --> 09:51.670
हथेलियों को पूरी तरह खोलें।

10:00.910 --> 10:03.830
स्कंध चक्र सीधा खड़े हो जाए।

10:07.960 --> 10:10.400
बाय हाथ की उंगलियों को बाई कंधे

10:10.400 --> 10:13.280
पर रखे और उसी तरह दाये।

10:13.280 --> 10:16.150
हाथ की उंगलियों को दायें कंधे पर

10:16.150 --> 10:17.990
दोनों कोहनियों को

10:17.990 --> 10:19.720
पूरी तरह चकराकर।

10:19.720 --> 10:22.440
घुमाए आगे की ओर कोहनियों को

10:22.440 --> 10:25.130
घुमाते हुए वक्ष स्थल के सामने

10:25.130 --> 10:28.080
स्पर्श करने की कोशिश करें और जब

10:28.080 --> 10:30.200
कोहनियों को घुमाए तो उन्हें

10:30.200 --> 10:31.930
कानों के समीप ले जाने

10:31.930 --> 10:33.190
की कोशिश करे।

10:33.190 --> 10:35.490
इसी तरह विपरीत दिशा

10:35.490 --> 10:37.030
में बुझाओं को खीं।

10:37.030 --> 10:40.260
ते हुए घुमाए और कोशिश करे की इस

10:40.260 --> 10:43.320
दौरान बुझाए शरीर को स्पर्श करें।

10:43.320 --> 10:46.900
इस क्रिया को बाय सिताए अर्थात

10:46.900 --> 10:48.970
घड़ी की सुई की विपरीत दिशा

10:48.970 --> 10:51.010
में 5 बार दोहराएं।

10:51.010 --> 10:53.620
इस क्रिया के अभ्यास से हड्डियाँ,

10:53.620 --> 10:56.020
मासपेशिया और स्कंध क्षेत्र की

10:56.020 --> 10:57.885
तंत्रिकाएं स्वस्थ रहती है।

10:57.885 --> 11:00.650
यह अभ्यास गर्दन की रीड की हड्डी

11:00.650 --> 11:03.010
की अपकर्षक अर्थात सर्वाइकल

11:03.010 --> 11:04.510
स्पोंडिलाइटिस बीमारी को

11:04.510 --> 11:05.990
दूर करने में सहायक है।

11:08.390 --> 11:11.320
धड़ को घुमाना पावों को परस्पर

11:11.320 --> 11:13.200
2 फुट की दूरी पर रखें।

11:13.200 --> 11:16.040
दोनों हाथों को छाती की ऊँचाई तक

11:16.040 --> 11:18.550
इस प्रकार उठाए की दोनों हथेलियां

11:18.550 --> 11:20.240
एक दूसरे के सामने हो।

11:20.240 --> 11:22.500
सांस छोड़ें शरीर को दाहिनी,

11:22.500 --> 11:25.180
तरफ इतना घुमाये की बाईं हथेली

11:25.180 --> 11:27.520
दाहिने कंधे को स्पर्श कर ले।

11:27.520 --> 11:30.940
सांस भीतर लेते हुए वापस लौटे।

11:30.940 --> 11:34.260
अब सांस छोड़ें शरीर को बाईं तरफ

11:34.260 --> 11:36.680
इतना घुमाएँ की दाहिनी हथेली

11:36.680 --> 11:38.450
बाएं कंधे को स्पर्श कर ले।

11:40.630 --> 11:43.290
सांस भीतर लेते हुए वापस लौटें।

11:43.290 --> 11:44.180
पुनः।

11:44.180 --> 11:46.720
दोहराएं सांस लेते हुए

11:46.720 --> 11:47.850
धीरे धीरे करें।

11:52.530 --> 11:54.910
मेरुदंड या डिस्क संबंधी समस्या

11:54.910 --> 11:56.830
होने पर तथा मासिक धर्म के

11:56.830 --> 11:59.650
दौरान यह व्यायाम न करें।

11:59.650 --> 12:01.950
खड़ी मुद्रा में विश्राम करें।

12:06.100 --> 12:07.000
घुटनों को चलाना

12:09.200 --> 12:10.340
सांस भीतर लें।

12:10.340 --> 12:13.190
अपनी भुजाओं को कंधों तक उठाएं।

12:13.190 --> 12:14.580
सांस छोडें।

12:14.580 --> 12:17.460
घुटने मोड़ें तथा अपने शरीर को

12:17.460 --> 12:19.860
शुन्य की मुद्रा में नीचे लाएं।

12:19.860 --> 12:22.660
सांस भीतर लें और शरीर को सीधा

12:22.660 --> 12:25.220
करें 2 बार और दोहराएं।

12:25.220 --> 12:28.260
इस व्यायाम से घुटने तथा कूल्हे

12:28.260 --> 12:30.200
के जोड़ मजबूत होते हैं।

12:30.200 --> 12:32.340
अत्यधिक अर्थराइटिस्ट की समस्या

12:32.340 --> 12:34.860
होने पर इस व्यायाम को छोड़ दें।

12:34.860 --> 12:36.390
हाथों को नीचे लाते

12:36.390 --> 12:37.700
समय सांस छोड़ें

12:40.260 --> 12:42.500
आइये। अब योगासना की तरफ बढ़े।

12:45.300 --> 12:46.030
ताड़ासन।

12:46.030 --> 12:49.020
तार का अर्थ है ताड़ का पेड़।

12:49.020 --> 12:51.410
पैरों को परस्पर 2 इंच

12:51.410 --> 12:52.670
की दूरी पर रखें।

12:52.670 --> 12:55.230
उंगलियों को आपस में जकड़े तथा

12:55.230 --> 12:57.000
कलाइयों को बाहर की तरफ मोड़ें।

12:59.020 --> 13:01.520
सांस भीतर लें तथा भुजाओं को ऊपर

13:01.520 --> 13:02.970
उठाते हुए कंधों की

13:02.970 --> 13:04.340
सीध में ले जाए।

13:04.340 --> 13:06.950
एडियों को भूमि से ऊपर उठाएं

13:06.950 --> 13:09.250
और अंगूठों पर संतुलित हो।

13:09.250 --> 13:11.480
इस स्थिति में 10 से पंद्रह

13:11.480 --> 13:12.260
सेकंड तक रहें।

13:14.120 --> 13:16.780
यह आसन शरीर में मजबूती लाता है।

13:16.780 --> 13:19.060
रीड से जुड़ी तांत्रिकां के संतुलन

13:19.060 --> 13:20.960
को ठीक करने में सहायता देता है

13:20.960 --> 13:23.590
और गलत मुद्राओं को ठीक करता है।

13:23.590 --> 13:26.400
सांस छोड़े एड़ियों को निचे लाये।

13:26.400 --> 13:28.360
उंगलियों की जकड़न को खोले।

13:28.360 --> 13:31.175
हाथों को धड़ के सामान नीचे लाएं

13:31.175 --> 13:32.750
और खड़े होने की मुद्रा

13:32.750 --> 13:33.550
में वापस आए।

13:36.810 --> 13:37.550
वक्ष शासन

13:39.990 --> 13:41.590
वक्ष का अर्थ है पेड़।

13:43.370 --> 13:45.380
दोनों पैरों में 2 इंच की

13:45.380 --> 13:47.470
दूरी बनाकर खड़े हो जाए।

13:47.470 --> 13:49.980
आँखों के सामने किसी बिंदु

13:49.980 --> 13:52.125
पर ध्यान केंद्रित करें।

13:52.125 --> 13:55.150
श्वास को शरीर के बाहर छोड़ते हुए

13:55.150 --> 13:57.460
दाएं पैर को मोड़कर उसके

13:57.460 --> 13:58.480
पंजे को बाएं।

13:58.480 --> 14:00.970
पैर की अंदरूनी जांघ पर रखें।

14:00.970 --> 14:04.490
अभ्यास करते समय ध्यान रखे की एडी

14:04.490 --> 14:07.040
मूलाधार अर्थात पेरिनियम क्षेत्र

14:07.040 --> 14:08.750
से मिली होनी चाहिए।

14:08.750 --> 14:11.870
गहरी श्वास लेते हुए दोनों हाथों

14:11.870 --> 14:14.540
को ऊपर की और ले जाए और हथेलियों

14:14.540 --> 14:16.370
को परस्पर। मिलाए।

14:16.370 --> 14:18.820
इस स्थिति में 10 से पंद्रह

14:18.820 --> 14:19.970
सेकेंड तक रहें।

14:19.970 --> 14:22.200
इस दौरान सामान्य रूप से

14:22.200 --> 14:24.260
श्वास प्रश्वास करें।

14:24.260 --> 14:26.700
यह आसन तंत्रिका तंत्र की

14:26.700 --> 14:28.890
स्नायुओं को बेहतर और शरीर

14:28.890 --> 14:30.340
को संतुलित बनाता है।

14:30.340 --> 14:32.480
आर्थराइटिस रोग से ग्रसित होने

14:32.480 --> 14:35.270
पर इस आसन का अभ्यास न करे।

14:35.270 --> 14:38.670
श्वास छोड़ते हुए हाथों एवं दाए

14:38.670 --> 14:40.530
पैर को मूल अवस्था में

14:40.530 --> 14:42.140
वापस लेकर आएं।

14:42.140 --> 14:44.890
इस आसन का अभ्यास बाई

14:44.890 --> 14:46.220
पैर से भी करें।

14:46.220 --> 14:49.520
बाई पैर को मोड़कर उसके पंजे को

14:49.520 --> 14:51.230
दाये पैर की अंदरूनी

14:51.230 --> 14:52.450
जांग पर रखें।

14:52.450 --> 14:55.340
श्वास खींचते हुए दोनों हाथों को

14:55.340 --> 14:57.810
ऊपर की ओर ले जाएं और हथेलियों

14:57.810 --> 14:59.180
को बरस पर मिलाए

15:15.140 --> 15:15.580
दस्ता।

15:15.580 --> 15:15.900
सना

15:18.570 --> 15:20.570
पाद का अर्थ है पैर और

15:20.570 --> 15:21.930
हस्त का अर्थ है हाथ।

15:24.850 --> 15:26.600
धीरे धीरे सांस भीतर लें

15:26.600 --> 15:28.330
और हाथों को ऊपर उठाएं।

15:30.010 --> 15:32.700
शरीर को कमर से ऊपर की ओर खींचें।

15:32.700 --> 15:34.900
सांस छोड़ें तथा आगे की

15:34.900 --> 15:36.150
तरफ तब तक झुकें,

15:36.150 --> 15:38.200
जब तक पूरी हथेली धरती

15:38.200 --> 15:39.930
को स्पर्श करने लगे।

15:39.930 --> 15:42.510
इस अंतिम स्थिति को 10 से

15:42.510 --> 15:44.490
30 सेकंड तक बनाए रखें।

15:44.490 --> 15:46.310
जिन लोगों को पीठ की

15:46.310 --> 15:47.710
अकड़न की समस्या हो,

15:47.710 --> 15:49.580
उन्हें अपनी क्षमता के अनुरूप

15:49.580 --> 15:50.790
ही झुकना चाहिए।

15:50.790 --> 15:52.530
अब सांस भीतर लें।

15:52.530 --> 15:55.500
धीरे धीरे सीधी स्थिति में आए और

15:55.500 --> 15:57.560
भुजाओं को सिर के ऊपर ले जाकर।

15:57.560 --> 15:58.320
खींचें।

15:58.320 --> 16:00.540
सांस छोड़ें और धीरे धीरे

16:00.540 --> 16:02.130
प्रक्रियाओं को विपरीत क्रम में

16:02.130 --> 16:03.860
करते हुए प्रारंभिक स्थिति

16:03.860 --> 16:05.780
में आये विश्राम करें।

16:08.380 --> 16:09.300
अर्ध चक्रासन

16:12.000 --> 16:14.180
दोनों हाथों से कमर पर सहारा दे।

16:17.440 --> 16:20.380
सांस छोड़ें सिर को पीछे झुकाएं।

16:20.380 --> 16:22.840
गर्दन की मांसपेशियों को खींचे

16:22.840 --> 16:24.830
तथा रीढ़ के निचले हिस्से

16:24.830 --> 16:26.685
से पीछे की और झुके।

16:26.685 --> 16:28.690
सामान्य सांस लेते हुए

16:28.690 --> 16:29.840
विश्राम करें।

16:29.840 --> 16:31.820
इस स्थिति में 10 से

16:31.820 --> 16:33.470
30 सेकंड तक रहें।

16:33.470 --> 16:36.600
अर्ध चकरासन रीड को लचीला बनाता

16:36.600 --> 16:39.000
है तथा मेरू तंत्रिकाओं को

16:39.000 --> 16:40.660
मजबूती प्रदान करता है।

16:40.660 --> 16:42.260
यह सांस लेने की क्षमता

16:42.260 --> 16:43.690
को बेहतर बनाता है।

16:43.690 --> 16:45.200
सांस भीतर लें।

16:45.200 --> 16:46.740
धीरे धीरे वापस आएं

16:46.740 --> 16:47.930
तथा विश्राम करें।

16:49.460 --> 16:51.220
उच्च रक्त चाप के रोगियों को

16:51.220 --> 16:52.700
सावधानी से झुकना चाहिए।

16:55.080 --> 16:58.010
त्रिकोणासन त्रिकोण का अर्थ है

16:58.010 --> 17:01.040
त्रिभुज पैरों को परस्पर आरामदायक

17:01.040 --> 17:02.680
दूरी पर रख कर खड़े हों।

17:02.680 --> 17:04.490
हाथों को धीरे धीरे किनारे

17:04.490 --> 17:05.660
से तब तक उठाएं,

17:05.660 --> 17:07.380
जब तक वे स्तिज न हो जाए।

17:11.130 --> 17:13.530
सांस छोड़ें धीरे धीरे दाहिनी तरफ

17:13.530 --> 17:16.230
झुके और दाहिने हाथ को दाहिने।

17:16.230 --> 17:17.690
पैर के ठीक पीछे रखें।

17:19.368 --> 17:20.960
बाएं हाथ को दाहिने हाथ

17:20.960 --> 17:22.460
की सीध में खड़ा करें।

17:22.460 --> 17:24.819
सामान्य श्वास के साथ इस स्थिति

17:24.819 --> 17:27.480
में 10 से 30 सेकंड तक रहें।

17:27.480 --> 17:30.135
ये समतल पैर से बचाता है,

17:30.135 --> 17:32.460
पिंडलियों जांघो तथा कमर की

17:32.460 --> 17:33.750
मासपेशियों को मजबूती

17:33.750 --> 17:34.500
प्रदान करता है

17:36.000 --> 17:37.880
और मेरुदंड को लचीला बनाता है।

17:40.440 --> 17:42.070
सांस अंदर लेने के साथ ही

17:42.070 --> 17:43.870
धीरे धीरे वापस आए।

17:43.870 --> 17:46.610
बाईं तरफ के लिए फिर दोहराएं।

17:46.610 --> 17:49.540
स्लिप डिस्क साइटिका और उदर

17:49.540 --> 17:51.135
शलि चिकित्सा के उपरांत

17:51.135 --> 17:52.930
यह आसन न करें।

17:52.930 --> 17:54.720
अपनी शारीरिक सीमाओं

17:54.720 --> 17:55.870
से आगे न जाएं।

18:08.750 --> 18:09.350
भद्रासन

18:11.210 --> 18:13.130
आइए अब बैठने वाली मुद्राओं

18:13.130 --> 18:14.495
के लिए तैयार हूँ।

18:14.495 --> 18:16.520
भद्र का अर्थ है ड्रेड

18:18.360 --> 18:20.560
पाव को सामने की तरफ फैलाकर।

18:20.560 --> 18:21.870
सीधे बैठें

18:21.870 --> 18:24.510
हाथों को कूल्हों के पास रखें।

18:24.510 --> 18:25.760
यह दंड आसन है।

18:27.440 --> 18:28.930
अब अपने पैरों के तलवों

18:28.930 --> 18:30.170
को एक साथ रखें।

18:30.170 --> 18:32.830
सांस छोड़ें और अपने हाथों को अपने

18:32.830 --> 18:34.700
पैरों के अंगूठों पर कसे।

18:34.700 --> 18:37.210
अपनी एडियों को जितना सम्भव हो

18:37.210 --> 18:39.570
उतना मूलाधार के पास लाएं।

18:39.570 --> 18:41.880
यह अंतिम स्थिति है।

18:41.880 --> 18:44.240
इस स्थिति में कुछ देर तक रहें।

18:50.600 --> 18:53.160
भद्रासन शरीर को दृढ रखता है और

18:53.160 --> 18:54.800
मस्तिष्क को स्थिर करता है।

18:57.980 --> 18:59.990
अब अपने पैरों को खींचें और

18:59.990 --> 19:01.280
विश्राम की अवस्था में आए।

19:03.060 --> 19:05.440
एक्यूट आर्थराइटिस अथवा साइटी का

19:05.440 --> 19:07.600
होने पर यह अभ्यास न करें।

19:11.000 --> 19:11.680
वज्रासन

19:13.360 --> 19:16.250
सर्वप्रथम दंडासन में बैठ जाएं।

19:16.250 --> 19:18.050
पैरों को मोड़ते हुए

19:18.050 --> 19:19.940
एड़ियों पर बैठ जाए।

19:19.940 --> 19:23.525
जांघों को सटाकर रखें एवं अंगूठे

19:23.525 --> 19:25.410
एक दूसरे से सटे हुए हों।

19:27.130 --> 19:29.240
हाथों को घुटनों पर रखें।

19:29.240 --> 19:31.530
सिर से पाँव तक शरीर

19:31.530 --> 19:33.020
को सीधा रखें।

19:33.020 --> 19:36.030
इस आसन को वज्रासन कहते हैं।

19:41.530 --> 19:44.470
अर्ध उष्ट्रासन सर्वप्रथम

19:44.470 --> 19:46.490
वज रासन में बैठ जाए।

19:46.490 --> 19:49.200
घुटनों के बल खड़े हो जाएं।

19:49.200 --> 19:51.860
हाथों को कमर पर इस प्रकार रखे

19:51.860 --> 19:54.540
की उंगलियां जमीन की ओर हो।

19:54.540 --> 19:56.240
कोहनियों एवं कंधों

19:56.240 --> 19:58.070
को समानांतर रखें।

19:58.070 --> 20:00.960
अब सिर को पीछे की तरफ झुकाते हुए

20:00.960 --> 20:03.550
ग्रीवा की मासपेशियों को खींचे।

20:03.550 --> 20:06.560
श्वास को अंदर खींचते हुए धड़ को

20:06.560 --> 20:09.230
जितना सम्भव हो सके उतना झुकाए।

20:09.230 --> 20:11.870
श्वास बाहर छोड़ते हुए इस स्थिति

20:11.870 --> 20:13.550
में शिथिल हो जाए।

20:13.550 --> 20:16.650
सामान्य रूप से श्वास प्रश्वास

20:16.650 --> 20:19.250
करते हुए इस स्थिति में 10

20:19.250 --> 20:21.430
से 30 सेकंड तक रुके।

20:21.430 --> 20:24.760
इस योगाभ्यास से पीठ और गर्दन की

20:24.760 --> 20:26.960
मासपेशियां मजबूत होती हैं।

20:26.960 --> 20:29.230
कब्ज एवं पीठ दर्द से

20:29.230 --> 20:30.440
मुक्ति मिलती है।

20:30.440 --> 20:32.680
श्वास खींचते हुए वापस

20:32.680 --> 20:34.060
वज रासन में बैठ जाए।

20:35.640 --> 20:36.400
शिथिल हो जाए।

20:40.160 --> 20:40.840
उष्ट्रासन

20:43.040 --> 20:45.180
वज रासन में बैठ जाएं।

20:45.180 --> 20:48.100
घुटनों को जमीन पर टिकाते हुए

20:48.100 --> 20:50.520
अपने दोनों पैरों की जांग और

20:50.520 --> 20:53.040
पंजों को आपस में मिला लीजिये।

20:53.040 --> 20:56.350
घुटनों और पंजों के बीच कुछ इंचों

20:56.350 --> 20:58.380
की दूरी रखते हुए घुटनों

20:58.380 --> 20:59.980
के बल खड़े हो जाएं।

20:59.980 --> 21:02.270
श्वास खींचते हुए धीरे

21:02.270 --> 21:04.450
से पीछे की ओर झुके।

21:04.450 --> 21:05.810
धीरे धीरे,

21:05.810 --> 21:08.350
दाहिने हाथ से दाहिनी एडी

21:08.350 --> 21:10.260
और बाये हाथ से बाईं।

21:10.260 --> 21:12.460
एड़ी को पकड़ने का प्रयास करें।

21:12.460 --> 21:14.175
इस बात का ध्यान रखें।

21:14.175 --> 21:16.570
कि पीछे झुकते समय गर्दन

21:16.570 --> 21:18.270
को झटका न लगे।

21:18.270 --> 21:20.750
उस शासन दृष्टिकोण में

21:20.750 --> 21:22.500
अत्यंत लाभदायक है।

21:22.500 --> 21:24.990
यह पीठ एवं गर्दन के दर्द

21:24.990 --> 21:26.560
से आराम दिलाता है।

21:26.560 --> 21:29.540
यह उदर एवं नितंब की वसा को

21:29.540 --> 21:31.410
कम करने में सहायक है।

21:31.410 --> 21:32.980
उच्च रक्तचाप,

21:32.980 --> 21:35.860
हृदय रोगी व हर्निया के मरीजों

21:35.860 --> 21:38.420
को यह आसन नहीं करना चाहिए।

21:38.420 --> 21:40.900
श्वास खींचते हुए पुनः

21:40.900 --> 21:42.530
वज रासन में बैठ जाए।

21:45.570 --> 21:47.270
शिथिल अवस्था में आ जाए।

21:50.590 --> 21:51.390
शशांकासन

21:52.930 --> 21:56.450
शशांक का अर्थ है शशक या खरगोश।

21:56.450 --> 21:58.670
दोनों घुटनों को दूर फैलाएं,

21:58.670 --> 22:00.490
जबकि अंगूठों को परस्पर

22:00.490 --> 22:01.740
स्पर्श करने दे।

22:01.740 --> 22:04.510
हथेलियों को घुटनों के बीच रखें।

22:04.510 --> 22:07.170
सांस छोड़ें और उन्हें धीरे धीरे

22:07.170 --> 22:08.930
पूरी लंबाई में खींचें।

22:08.930 --> 22:10.370
आगे झुके

22:10.370 --> 22:13.300
और थोड़ी को भूमि पर रखें।

22:13.300 --> 22:15.310
भुजाओं को समांतर रखे।

22:17.170 --> 22:18.820
सामने देखें और मुद्रा

22:18.820 --> 22:19.670
को बनाए रखें।

22:21.510 --> 22:23.400
यह तनाव और गुस्से को कम

22:23.400 --> 22:24.490
करने में सहायक है।

22:26.130 --> 22:28.290
सांस भीतर खींचें और उठें

22:30.110 --> 22:30.400
सांस,

22:30.400 --> 22:33.680
छोड़ें और वजासन में वापस आए।

22:33.680 --> 22:36.470
अपने पैरों को वापस विश्रामासन

22:36.470 --> 22:36.830
में लाएं।

22:41.040 --> 22:43.180
ओस्टोअर्थराइटिस के रोगियों को यह

22:43.180 --> 22:44.800
सावधानी के साथ करना चाहिए।

22:51.680 --> 22:53.200
उत्तान मंडूकासन

22:55.300 --> 22:57.710
इस आसन में शरीर की स्थिति

22:57.710 --> 22:59.410
उर्ध्वमुखी मेंढक जैसी

22:59.410 --> 23:00.650
हो जाती है।

23:00.650 --> 23:03.085
वज रासन में बैठ जाए।

23:03.085 --> 23:06.000
अंगूठों को सटाते हुए दोनों

23:06.000 --> 23:08.990
घुटनों को अधिक से अधिक फैलाएं।

23:08.990 --> 23:11.790
श्वास खींचते हुए अपने

23:11.790 --> 23:14.170
हाथों को ऊपर उठाएं।

23:14.170 --> 23:17.280
सिर के पीछे से दोनों हाथों को

23:17.280 --> 23:20.100
मोड़ें और हथेलियों को विपरीत

23:20.100 --> 23:21.510
कंधों पर रखें।

23:21.510 --> 23:24.619
अपनी पीठ और गर्दन को सीधा

23:24.620 --> 23:26.540
रखें और थोड़ी देर।

23:26.540 --> 23:28.190
इस स्थिति में बने रहें।

23:29.750 --> 23:32.780
यह आसन पीठ दर्द और ग्रीवा दर्द

23:32.780 --> 23:35.050
की तकलीफ से छुटकारा दिलाने

23:35.050 --> 23:36.690
में सहायक है।

23:36.690 --> 23:39.900
यह आसन शरीर के मध्य पट

23:39.900 --> 23:41.780
के लिए लाभदायक है।

23:41.780 --> 23:43.900
यह फेफड़े की कार्यक्षमता

23:43.900 --> 23:45.540
में वृद्धि करता है।

23:45.540 --> 23:48.280
घुटनों व जोड़ों के दर्द से पीड़ित

23:48.280 --> 23:50.480
व्यक्तियों को इस आसन से

23:50.480 --> 23:52.360
परहेज करना चाहिए।

23:52.360 --> 23:56.110
वापसी में श्वास खींचते हुए दोनों

23:56.110 --> 23:57.810
हाथों को धीरे धीरे सीधा

23:57.810 --> 23:59.650
करें और वापस ले आए।

24:03.750 --> 24:06.100
अपने घुटनों को मिलाकर पूर्व

24:06.100 --> 24:07.550
वत स्थिति में ले आए।

24:14.160 --> 24:14.720
वक्रासन

24:16.380 --> 24:18.800
वक्र का अर्थ है टेढ़ा या मुड़ा हुआ

24:20.720 --> 24:22.790
दाहिनी टांग को मोड़ें और दाहिने

24:22.790 --> 24:25.050
पैर को बाएं घुटने के साथ रखें।

24:25.050 --> 24:27.440
बाईं भुजा को दाहिने घुटने पर

24:27.440 --> 24:29.520
लपेटें और हथेली को दाहिने

24:29.520 --> 24:30.950
पैर के पास रखें।

24:30.950 --> 24:33.660
सांस छोड़ें शरीर तथा गर्दन

24:33.660 --> 24:34.820
को दाहिनी तरफ मोड़ें।

24:38.820 --> 24:40.520
इस मुद्रा में आराम से रहें।

24:42.920 --> 24:44.880
अपना सर पीछे घुमाए

24:44.880 --> 24:47.880
सांस छोड़ते हुए अपने हाथ बाहर

24:47.880 --> 24:50.580
निकाले। पैरों को सीधा फैलाएं।

24:50.580 --> 24:53.600
अब वापस आएं और विश्राम

24:53.600 --> 24:54.790
आसन में विश्राम करें।

24:56.430 --> 24:58.530
यह आसन मेरुदंड के लचीले

24:58.530 --> 25:00.110
पन को बढ़ाता है।

25:00.110 --> 25:03.260
यह कब्ज तथा अपच दूर करने और

25:03.260 --> 25:05.210
मधुमेह के प्रबंधन में सहायक है।

25:07.210 --> 25:08.850
इसे दूसरी तरफ के लिए दोहराएं।

25:26.240 --> 25:28.730
अपना सिर पीछे घुमाएं सांस छोड़ते

25:28.730 --> 25:31.380
हुए अपने हाथ बाहर निकाले।

25:31.380 --> 25:33.580
पैरों को सीधा फैलाएं।

25:35.390 --> 25:37.560
अब वापस आयें और विश्राम

25:37.560 --> 25:38.710
आसन में विश्राम करें।

25:45.590 --> 25:46.170
मकर आसन

25:48.230 --> 25:50.480
मकर का अर्थ है मगरमछ।

25:50.480 --> 25:52.940
पेट के बल इस प्रकार लेट जाएं

25:52.940 --> 25:55.110
की टांगे एक दुसरे से दूर हो।

25:55.110 --> 25:57.570
त तथा पैर बाहर की ओर हो।

25:57.570 --> 26:00.190
दोनो बाहें मोड़ ले तथा दाहिने

26:00.190 --> 26:02.340
हाथ को बाएं हाथ पर रखें।

26:02.340 --> 26:04.530
अपने सिर को हाथों पर

26:04.530 --> 26:06.310
रख लें आराम करें।

26:06.310 --> 26:08.050
यह मकर आसन है।

26:08.050 --> 26:10.880
यह आसन सभी अधोमुखी मुद्राओं में

26:10.880 --> 26:12.720
विश्राम के लिए किया जाता है।

26:12.720 --> 26:14.450
यह पीठ के निचले हिस्से

26:14.450 --> 26:15.800
को आराम पहुँचाता है।

26:19.370 --> 26:20.070
भुजंगासन

26:22.170 --> 26:23.470
अब अधोमुखी मुद्राओं

26:23.470 --> 26:25.150
के लिए तैयार हूँ।

26:25.150 --> 26:28.730
भुजंग का अर्थ है सर्प या कोबरा

26:31.430 --> 26:32.990
पेट के बल लेट जाएं।

26:32.990 --> 26:35.740
सिर को हाथों पर रखें और शरीर

26:35.740 --> 26:37.090
को आराम से रहने दे।

26:38.760 --> 26:40.840
अब टांगों को आपस में जोड़े

26:40.840 --> 26:42.240
और बाहों को खींचें

26:44.320 --> 26:45.640
माथे को भूमि पर रखें।

26:48.040 --> 26:50.510
अब अपनी हथेलियों को छाती के पास

26:50.510 --> 26:53.130
रखें और कोहनियों को उठाएं

26:53.130 --> 26:56.270
सांस भीतर लें और थोड़ी तथा नाभी

26:56.270 --> 26:59.245
के हिस्से तक छाती को ऊपर उठाएं।

26:59.245 --> 27:01.070
यह भुजंग आसन है।

27:02.770 --> 27:04.580
यह आसन तनाव के प्रबंधन

27:04.580 --> 27:06.160
के लिए सर्वोत्तम है।

27:06.160 --> 27:09.040
यह पीठ दर्द तथा श्वास संबंधी

27:09.040 --> 27:11.660
समस्याओं से निबटने में सहायक है।

27:11.660 --> 27:12.890
सांस छोड़ें

27:14.590 --> 27:16.910
अपने माथे को भूमि पर रहने दे

27:16.910 --> 27:18.650
तथा बाहों को खींचें।

27:20.680 --> 27:21.840
अपनी टांगें फैलाएं।

27:24.280 --> 27:26.790
हथेलियां ऊंची करें तथा अपने सिर

27:26.790 --> 27:28.110
को हथेलियों पर रखें

27:28.110 --> 27:29.220
और आराम करें।

27:31.220 --> 27:31.860
शलभासन

27:33.400 --> 27:36.540
शलभ का अर्थ है पतंगा या टिड्डा।

27:36.540 --> 27:38.190
पेट के बल लेट जाएं।

27:38.190 --> 27:40.285
टांगें आपस में जोड़ लें।

27:40.285 --> 27:42.670
थोड़ी को भूमि पर रखें।

27:42.670 --> 27:45.690
दोनों हाथ शरीर के किनारे ऐसे रखे

27:45.690 --> 27:48.100
की हथेलियां ऊपर की ओर हो।

27:48.100 --> 27:49.780
सांस भीतर लें।

27:49.780 --> 27:51.270
अपनी टांगों को भूमि

27:51.270 --> 27:52.920
से उतना ऊपर उठाएं।

27:52.920 --> 27:54.720
जितना आप बिना घुटनों को

27:54.720 --> 27:55.950
मोड़े हुए उठा सके।

27:58.050 --> 28:00.210
बाहों और टांगों को इस तरह फैलाएं

28:00.210 --> 28:01.950
की शरीर आसानी से भूमि

28:01.950 --> 28:03.190
से ऊपर उठ जाए।

28:03.190 --> 28:05.630
इस स्थिति में आराम से रहें।

28:05.630 --> 28:09.010
यह आसन साइटिका तथा पीठ के निचले

28:09.010 --> 28:10.950
हिस्से के दर्द में राहत देता है।

28:10.950 --> 28:12.560
यह कूल्हे की मासपेशियों

28:12.560 --> 28:14.010
को आकार देता है।

28:14.010 --> 28:16.150
अब सांस छोड़ें टांगों को

28:16.150 --> 28:17.510
नीचे भूमि की ओर ले आए।

28:19.310 --> 28:20.020
अपनी बाहें,

28:20.020 --> 28:20.970
निकालें

28:20.970 --> 28:23.440
और भूमि पर विश्राम करें।

28:23.440 --> 28:25.790
हृदय रोगियों को यह मुद्रा

28:25.790 --> 28:26.760
नहीं करनी चाहिए।

28:29.960 --> 28:30.940
सेतु बंधासन

28:33.500 --> 28:36.000
उर्द्व मुखि या पीठ के बल लेट कर

28:36.000 --> 28:38.180
की जाने वाली मुद्राओं की ओर

28:38.180 --> 28:41.420
सेतु बंध का अर्थ है पुल बनाना।

28:41.420 --> 28:43.590
टांगों को आपस में जोड़े।

28:43.590 --> 28:46.245
बाहों को शरीर के किनारे रखे।

28:46.245 --> 28:48.930
दोनों टांगों को घुटनों पर मोड़ें

28:48.930 --> 28:51.050
और एड़ियों को नितंबों के पास ले

28:51.050 --> 28:53.180
जाएं। दोनों एडियों को कस कर

28:53.180 --> 28:53.510
पकड़े

28:55.330 --> 28:56.570
सांस भीतर लें।

28:56.570 --> 28:59.390
धीरे धीरे नितंबों तथा धड़ को पुल

28:59.390 --> 29:01.840
बनाने के लिए उतना ऊँचा उठाएं,

29:01.840 --> 29:04.120
जितना आप उठा सकते हैं,

29:04.120 --> 29:05.470
आराम से रहें।

29:07.290 --> 29:08.390
यही अंतिम मुद्रा है।

29:10.020 --> 29:12.450
यह आसन अवसाद तथा व्यग्रता

29:12.450 --> 29:14.140
से मुक्ति देता है।

29:14.140 --> 29:16.330
यह पीठ के निचले हिस्से की

29:16.330 --> 29:18.420
मासपेशियों को मजबूत बनाता है।

29:20.000 --> 29:22.810
अब सांस छोड़ें धीरे धीरे मूल

29:22.810 --> 29:24.760
स्थिति में आये और विश्राम करें

29:27.000 --> 29:28.180
पीठ के बल लेट जाएं।

29:32.460 --> 29:33.560
कृपया ध्यान रखें,

29:33.560 --> 29:35.600
गर्भावस्था के बाद की तिमाहियों

29:35.600 --> 29:37.160
वाली महिलाएं इस आसन

29:37.160 --> 29:38.240
का प्रयोग न करें।

29:41.620 --> 29:45.470
उत्तानपाद आसन इस आसन में पीठ के

29:45.470 --> 29:47.430
बल लेट कर पैरों को ऊपर

29:47.430 --> 29:48.520
उठाया जाता है।

29:48.521 --> 29:51.370
इसी कारण इस आसन का नामकरण

29:51.370 --> 29:53.980
उत्तानपाद आसन हुआ है।

29:53.980 --> 29:56.470
जमीन पर आराम से पीठ

29:56.470 --> 29:57.650
के बल लेट जाएं।

29:57.651 --> 30:00.250
पैरों की स्थिति सीधी हो और

30:00.250 --> 30:02.330
हाथों को बगल में रखें।

30:02.330 --> 30:05.220
श्वास लेते हुए घुटनों को बिना

30:05.220 --> 30:08.330
मोड़े धीरे धीरे अपने दोनों पैरों

30:08.330 --> 30:10.930
को ऊपर उठाएं और 30 डिग्री

30:10.930 --> 30:12.565
का कोण बनाए।

30:12.565 --> 30:15.360
सामान्य रूप से श्वास प्रश्वास

30:15.360 --> 30:17.500
करते हुए इस अवस्था में

30:17.500 --> 30:19.100
कुछ देर बने रहे।

30:19.100 --> 30:22.230
श्वास छोड़ते हुए धीरे धीरे अपने

30:22.230 --> 30:24.550
दोनों पैरों को नीचे लाएं

30:24.550 --> 30:26.680
और जमीन पर रखें।

30:26.680 --> 30:30.760
यह आसन नाभी केंद्र अर्थात नाभि

30:30.760 --> 30:32.520
मणि चक्र में संतुलन

30:32.520 --> 30:33.510
स्थापित करता है।

30:37.530 --> 30:38.550
अर्ध हलासन

30:40.350 --> 30:43.370
इस आसन में शरीर की स्थिति खेतों

30:43.370 --> 30:46.150
की जुताई करने वाले भारतीय हल्की

30:46.150 --> 30:48.710
अर्ध आकृति जैसी हो जाती है।

30:48.710 --> 30:52.930
इसी कारण इसका नाम हल आसन पड़ा है।

30:52.930 --> 30:55.715
पीठ के बल लेट जाएं।

30:55.715 --> 30:58.800
दोनों हाथ जांघों के बगल में रखें

30:58.800 --> 31:01.730
और हथेलियां जमीन पर टिका दें।

31:01.730 --> 31:04.740
घुटनों को बिना मोड़े अपने पैरों

31:04.740 --> 31:07.390
को धीरे धीरे ऊपर उठाएं।

31:07.390 --> 31:09.700
सर्व प्रथम अपने पैरों को

31:09.700 --> 31:11.510
30 डिग्री तक उठाएं।

31:11.510 --> 31:15.000
तत्पश्चात 60 डिग्री का कोण बनाए।

31:15.000 --> 31:18.060
अब धीरे धीरे पैरों को 90 डिग्री

31:18.060 --> 31:20.290
के कोण की स्थिति में ले आएं।

31:20.290 --> 31:22.780
यह अर्ध हलासन की पूर्ण

31:22.780 --> 31:23.730
स्थिति है।

31:23.730 --> 31:26.390
इस अवस्था में शरीर की स्थिति

31:26.390 --> 31:28.340
नितंब से कंधे तक सीधी

31:28.340 --> 31:28.940
होनी चाहिए।

31:31.400 --> 31:33.600
धीरे धीरे अपने पैरों को

31:33.600 --> 31:35.570
वापस जमीन पर लाएं।

31:35.570 --> 31:38.575
ध्यान रहे वापसी की स्थिति में

31:38.575 --> 31:41.170
सिर जमीन से ऊपर न उठे।

31:41.170 --> 31:44.020
यह आसन गहरे तनाव से ग्रस्त

31:44.020 --> 31:45.630
व्यक्तियों के लिए अत्यंत

31:45.630 --> 31:46.680
लाभदायक है।

31:46.680 --> 31:49.010
परन्तु उन्हें बड़ी सावधानी

31:49.010 --> 31:51.425
पूर्वक यह आसन करना चाहिए।

31:51.425 --> 31:53.900
पीठ के निचले हिस्से के दर्द से

31:53.900 --> 31:56.190
पीड़ित व्यक्तियों को दोनों पैरों

31:56.190 --> 31:58.180
के साथ इस आसन को नहीं

31:58.180 --> 31:58.840
करना चाहिए।

32:02.600 --> 32:04.130
पवन मुक्त आसन

32:04.130 --> 32:05.410
दोनों घुटने,

32:05.410 --> 32:07.090
मोड़े तथा जांगों को

32:07.090 --> 32:08.520
छाती के पास लाएं।

32:08.520 --> 32:11.010
उंगलियों को आपस में जकड़ ले और

32:11.010 --> 32:12.550
घुटनों के नीचे पिंडलियों

32:12.550 --> 32:14.300
को अच्छी तरह पकड़ ले।

32:14.300 --> 32:17.250
सिर तथा कंधे उठाये और घुटनों को

32:17.250 --> 32:19.400
थोड़ी से छूने का प्रयास करें।

32:19.400 --> 32:21.260
यह पवन मुक्त आसन है।

32:24.320 --> 32:26.120
यह कब्ज दूर करता है,

32:26.120 --> 32:28.890
उदर वायु से मुक्ति दिलाता है

32:28.890 --> 32:31.700
और पीछे की मास्पेशियों तथा मेरु

32:31.700 --> 32:33.200
तंत्रिकाओं को ठीक करता है।

32:35.250 --> 32:36.920
अपना सिर पीछे लाएं।

32:36.920 --> 32:37.970
सांस छोड़ें।

32:40.410 --> 32:42.130
अपनी टांगों को सीधा फैलाएं

32:46.570 --> 32:47.190
आराम करें।

32:48.790 --> 32:50.720
उधर की चोटों, हरनिया,

32:50.720 --> 32:53.060
साइटिका तथा गर्भावस्था

32:53.060 --> 32:54.730
में यह अभ्यास न करें।

33:00.300 --> 33:00.820
शव आसन

33:02.720 --> 33:04.500
शव का अर्थ है मृत शरीर।

33:06.300 --> 33:08.200
यह आसन संपूर्ण विश्राम

33:08.200 --> 33:09.200
के लिए किया जाता है।

33:11.000 --> 33:12.930
अपनी भुजाओं और टांगों को फैला

33:12.930 --> 33:15.795
कर, आराम से पीठ के बल लेट जाएं।

33:15.795 --> 33:17.810
हथेलियां ऊपर की ओर हो

33:19.770 --> 33:20.630
आँखें बंद कर लें।

33:22.610 --> 33:24.520
पूरे शरीर को जागर भाव

33:24.520 --> 33:25.270
से विश्राम दे।

33:27.810 --> 33:29.450
प्राकृतिक श्वास से परिचित हों।

33:31.790 --> 33:33.850
इसे लयबद्ध और धीमा होने दें।

33:36.750 --> 33:38.680
ताजगी पूर्ण और निश्चिंतता की

33:38.680 --> 33:40.090
अनुभूति होने तक इस

33:40.090 --> 33:41.550
अवस्था में रहे।

33:41.550 --> 33:44.210
यह आसन सभी प्रकार के तनावों

33:44.210 --> 33:45.700
से मुक्ति देता है

33:45.700 --> 33:48.450
और शरीर तथा मस्तिष्क दोनों

33:48.450 --> 33:49.330
को विश्राम देता है।

33:50.950 --> 33:53.040
यह तनाव तथा उसके परिणामों के

33:53.040 --> 33:54.510
प्रबंधन में बहुत सहायक है।

34:28.489 --> 34:29.370
कपालभाति

34:33.230 --> 34:35.580
यह मस्तिष्क के अग्र भाग के श्वसन

34:35.580 --> 34:37.760
केंद्रों को उत्तेजित करता है।

34:37.760 --> 34:39.690
ध्यान की किसी भी मुद्रा

34:39.690 --> 34:40.969
में बैठ जाएं,

34:40.969 --> 34:43.469
आंखें बंद करें और पूरे

34:43.469 --> 34:44.670
शरीर को विश्राम दें।

34:46.380 --> 34:47.960
गहरी सांस भीतर लें।

34:47.960 --> 34:49.409
सीना फुलाए

34:49.409 --> 34:51.820
सांस को उधर की मासपेशियों के

34:51.820 --> 34:54.310
बलशाली संकुचन से बाहर निकालें।

34:54.310 --> 34:56.969
शांत रूप से सांस भीतर लेना और

34:56.969 --> 34:58.590
सक्रिय रूप से बाहर निकालना

34:58.590 --> 34:59.240
जारी रखें।

35:29.680 --> 35:31.440
फिर एक गहरी सांस लें।

35:31.440 --> 35:33.310
धीरे धीरे बाहर निकालें

35:33.310 --> 35:34.340
और विश्राम लें।

35:35.980 --> 35:38.300
इस प्रक्रिया को 30 बार करें।

35:38.300 --> 35:41.500
यह कपाल भाति का एक चक्र है।

35:41.500 --> 35:43.800
प्रत्येक चक्र के अंत में

35:43.800 --> 35:46.040
गहरी सांस लेनी चाहिए।

35:46.040 --> 35:48.160
अब दो चक्र और करें।

36:20.770 --> 36:22.860
कपाल भाती सामने की वायु नलिकाओं

36:22.860 --> 36:24.100
को स्वच्छ करता है।

36:24.100 --> 36:26.460
इससे कफ संबंधी समस्याओं के निदान

36:26.460 --> 36:28.340
में सहायता मिलती है।

36:28.340 --> 36:30.820
ये है ठंड, रायनाइटिस,

36:30.820 --> 36:32.010
साइनोसाइटिस,

36:32.010 --> 36:34.880
अस्थमा तथा श्वास संबंधी रोगों

36:34.880 --> 36:36.270
के उपचार में सहायक हैं।

36:45.430 --> 36:46.610
कृपया, ध्यान रखें,

36:46.610 --> 36:48.480
हृदय संबंधी परेशानियों,

36:48.480 --> 36:50.820
उच्च रक्तचाप, चक्कर, आना,

36:50.820 --> 36:52.690
माइग्रेन, स्ट्रोक,

36:52.690 --> 36:54.540
हर्निया तथा गैस्टिक।

36:54.540 --> 36:56.950
अल्सर होने पर इसका भ्यास न करें।

37:00.010 --> 37:00.750
प्राणायाम

37:02.470 --> 37:02.780
नाडी,

37:02.780 --> 37:05.430
शोधन या अनुलोम विलोम प्राणायाम।

37:08.530 --> 37:09.290
क्रमशः,

37:09.290 --> 37:11.610
बाएं तथा दाएं नासिका छेदों

37:11.610 --> 37:12.990
से सांस लेना है।

37:12.990 --> 37:15.535
ध्यान की मुद्रा में बैठ जाएं।

37:15.535 --> 37:17.970
मेरुदंड सीधा रखें।

37:17.970 --> 37:21.160
सिर ऊँचा तथा आँखें बंद हो।

37:21.160 --> 37:23.790
शरीर को कुछ गहरी सांसें लेकर

37:23.790 --> 37:25.220
आराम की स्थिति में लाएं।

37:28.680 --> 37:30.160
बाईं हथेली को बाएं।

37:30.160 --> 37:32.500
घुटने पर ज्ञान मुद्रा में रखें

37:32.500 --> 37:34.700
दाया हाथ नासाग्रमुद्रा

37:34.700 --> 37:35.500
में होना चाहिए।

37:37.050 --> 37:38.850
दायें अंगूठे को दाहिने नासिका

37:38.850 --> 37:40.030
छिद्र पर रखें।

37:40.030 --> 37:41.380
बायें नासिका छिद्र

37:41.380 --> 37:43.140
से श्वास अंदर ले।

37:43.140 --> 37:44.870
फिर इसे बंद कर लें।

37:47.670 --> 37:48.900
दाहिने नासिका छिद्र से

37:48.900 --> 37:50.010
श्वास बाहर निकालें।

37:51.550 --> 37:53.640
अगली बार दाहिने नासिका छिद्र

37:53.640 --> 37:54.750
से सांस भीतर लें।

37:56.870 --> 37:59.690
दाहिना नासिका छिद्र बंद करें और

37:59.690 --> 38:00.970
बाएं नासिका छिद्र से

38:00.970 --> 38:02.070
श्वास बाहर निकालें।

38:06.530 --> 38:09.010
यह नाड़ी शोधन या अनुलोम विलोम

38:09.010 --> 38:10.470
प्राणायम का एक चक्र है।

38:12.230 --> 38:13.790
5 चक्र और पूरे करें,

38:19.050 --> 38:21.040
जो अनुलोम विलोम प्राणायम प्रारंभ

38:21.040 --> 38:22.545
करने वाले नए लोग हैं,

38:22.545 --> 38:24.450
उनके लिए श्वास अंदर

38:24.450 --> 38:26.210
खींचने और बाहर करने का

38:26.210 --> 38:28.120
समय समान होना चाहिए।

38:28.120 --> 38:30.960
धीरे धीरे इनके समय का अनुपात बढ़ा

38:30.960 --> 38:33.560
कर 1 अनुपात 2 करना चाहिए।

38:33.560 --> 38:34.750
सांस धीमी,

38:34.750 --> 38:37.210
स्थिर तथा नियंत्रित होनी चाहिए।

38:37.210 --> 38:39.530
इस प्राणायाम का उद्देश्य ऊर्जा

38:39.530 --> 38:40.810
के सभी प्रमुख मार्गों

38:40.810 --> 38:41.970
को शुद्ध करना है।

38:41.970 --> 38:44.660
यह पूरे शरीर को प पोषित करता है।

38:44.660 --> 38:47.280
यह चित्त को शांत करता है और

38:47.280 --> 38:48.530
एकाग्रता बढ़ाने में

38:48.530 --> 38:49.890
सहायता देता है।

38:49.890 --> 38:52.420
यह प्राण शक्ति बढ़ाता है

38:52.420 --> 38:54.650
और तनाव तथा व्यग्रता के

38:54.650 --> 38:56.130
स्तर को कम करता है।

38:56.130 --> 38:57.910
यह कफ संबंधी दोषों का

38:57.910 --> 38:58.950
भी निवारण करता है।

39:06.360 --> 39:09.020
शीतली प्राणायाम शीत

39:09.020 --> 39:10.750
का अर्थ है ठंडा।

39:10.750 --> 39:13.580
यह प्राणायाम साधक के चित्त को

39:13.580 --> 39:16.460
शांत करता है और मन की व्यग्रता

39:16.460 --> 39:17.970
को दूर करता हैं।

39:17.970 --> 39:20.170
शीतली प्राणायाम अपने नाम के

39:20.170 --> 39:23.230
अनुरूप शरीर और मन को शांति

39:23.230 --> 39:24.580
प्रदान करता है।

39:24.580 --> 39:28.400
पदमासन अथवा किसी भी आरामदायक

39:28.400 --> 39:30.310
आसन में बैठ जाएं।

39:30.310 --> 39:31.040
अंजलि,

39:31.040 --> 39:33.280
मुद्रा अथवा ज्ञान मुद्रा की

39:33.280 --> 39:35.270
अवस्था में अपने हाथों

39:35.270 --> 39:37.560
को घुटनों पर रख लें।

39:37.560 --> 39:40.700
जीप को किनारों से मोड़कर ट्यूब

39:40.700 --> 39:42.840
की आकृति जैसा बना ले।

39:42.840 --> 39:46.130
इस ट्यूब नुमा जीप से सांस लेते

39:46.130 --> 39:49.640
हुए जितना हो सके वायु को फेफड़ों

39:49.640 --> 39:52.620
में भरे और मुंह बंद कर लें

39:52.620 --> 39:55.100
और दोनों नासिका रंध्रों से

39:55.100 --> 39:56.970
धीरे धीरे श्वास छोड़ें।

39:58.650 --> 40:00.460
शीतली प्राणायाम रक्त

40:00.460 --> 40:02.250
को शुद्ध करता है।

40:02.250 --> 40:04.500
यह शरीर में शीतलता

40:04.500 --> 40:06.010
प्रदान करता है।

40:06.010 --> 40:08.430
उच्च रक्तचाप वाले व्यक्तियों

40:08.430 --> 40:11.540
के लिए यह विशेष लाभप्रद है।

40:11.540 --> 40:16.010
यह भूख और प्यास का शमन करता है।

40:16.010 --> 40:19.080
कफ और पित्त के कारण होने वाली

40:19.080 --> 40:21.040
अपक्ष और अन्य विधियों

40:21.040 --> 40:22.859
को दूर करता है।

40:22.860 --> 40:25.370
यह त्वचा और नेत्र के

40:25.370 --> 40:27.390
लिए लाभदायक है।

40:27.390 --> 40:28.670
ठण्ड,

40:28.670 --> 40:32.640
कफ अथवा तुंडी का शोध अर्थात टोंस

40:32.641 --> 40:35.170
लाइटिस के मरीजों को यह प्राणायाम

40:35.170 --> 40:36.240
नहीं करना चाहिए।

40:50.720 --> 40:51.780
भ्रामरी प्राणायाम

40:58.190 --> 40:59.770
भ्रमर भौरे को कहते हैं।

41:01.350 --> 41:03.240
इस प्राणायाम में श्वास छोड़ने

41:03.240 --> 41:04.940
के समय जो ध्वनी निकलती है,

41:04.940 --> 41:06.960
वो भौरे के भुनभुन से मिलती

41:06.960 --> 41:07.690
जुलती लगती है।

41:09.630 --> 41:10.900
दोनों नाक छिद्रों से

41:10.900 --> 41:12.915
गहरी सांस भी कर ले।

41:12.915 --> 41:15.960
नियंत्रित तरीके से गहरी और स्थिर

41:15.960 --> 41:17.750
भौंरे की भुनभुन की जैसी धोनी

41:17.750 --> 41:19.580
के साथ श्वास बाहर छोड़ें।

41:28.380 --> 41:29.670
ये है भ्रामरी प्राणायाम

41:29.670 --> 41:30.950
का एक चक्र है,

41:30.950 --> 41:32.380
दो बार और दोहराएं।

41:43.610 --> 41:45.870
यह अनिद्रा की अच्छी दवा है।

41:45.870 --> 41:48.380
इसे तनाव संबंधी विकारों को दूर

41:48.380 --> 41:50.350
करने में बहुत कारगर पाया गया है।

42:05.900 --> 42:07.290
अब ब्रामणी को शनमुखी

42:07.290 --> 42:08.000
मुद्रा में करें

42:11.580 --> 42:13.150
अपने कानों को अंगूठों

42:13.150 --> 42:14.250
से बंद कर लें।

42:14.250 --> 42:16.820
अब तर्जनी को अपनी आँख पर,

42:16.820 --> 42:19.330
मध्यमा को नासा पुटो पर तथा

42:19.330 --> 42:21.220
अनामिका और कनिष्ठिका उँगलियों

42:21.220 --> 42:23.240
को अपने होठों पर रखे।

42:23.240 --> 42:25.600
अपनी नाक खोलें और दोनों

42:25.600 --> 42:27.805
छिद्रों से श्वास भीतर लें।

42:27.805 --> 42:30.430
नियंत्रित गति से धीरे धीरे भौरे

42:30.430 --> 42:31.960
की भुनभुन सी आवाज करते

42:31.960 --> 42:33.140
हुए श्वास छोड़ें

42:47.360 --> 42:49.580
यह एकाग्रता और ध्यान के प्रारंभ

42:49.580 --> 42:50.840
के लिए तैयारी करने

42:50.840 --> 42:51.720
का प्राणायाम है।

42:54.100 --> 42:54.460
ध्यान

42:56.740 --> 42:59.140
आइए अब ध्यान के लिए तैयार हूँ।

43:01.720 --> 43:03.360
ध्यान एक निरंतर चिंतन

43:03.360 --> 43:04.180
की प्रक्रिया है।

43:10.280 --> 43:12.160
ध्यान की किसी भी मुद्रा में बैठे

43:16.530 --> 43:18.780
अपने मेरुदंड को आरामदायक

43:18.780 --> 43:20.490
स्थिति में सीधा रखें।

43:20.490 --> 43:22.360
ज्ञान मुद्रा ग्रहण करें।

43:22.360 --> 43:24.090
अपनी हथेलियों को जांघों

43:24.090 --> 43:26.100
पर ऊपर की तरफ रखें।

43:26.100 --> 43:28.590
बुझाए और कंधे ढीले और आराम

43:28.590 --> 43:30.410
की स्थिति में होने चाहिए।

43:30.410 --> 43:33.170
अपनी आँखें बंद कर लें और चेहरे

43:33.170 --> 43:35.210
को हल्का सा ऊपर उठा कर बैठ जाए।

43:37.610 --> 43:39.010
आपको एकाग्र होने की

43:39.010 --> 43:40.300
आवश्यकता नहीं है।

43:40.300 --> 43:43.130
वरण केवल अपनी दोनों भौहों के बीच

43:43.130 --> 43:45.260
हल्का ध्यान दे और अपनी सांसों

43:45.260 --> 43:46.430
के प्रति जागरूक हो।

43:48.130 --> 43:49.930
ध्यान मस्तिष्क को शांत

43:49.930 --> 43:51.330
और आनंदमय रखता है।

43:53.290 --> 43:54.850
यह एकाग्रता स्मृति

43:54.850 --> 43:57.220
विचारों की स्पष्टता तथा इच्छा

43:57.220 --> 43:58.300
शक्ति को बढ़ाता है।

44:00.460 --> 44:02.880
यह पूरे शरीर और मस्तिष्क को सही

44:02.880 --> 44:04.920
तरह से आराम देकर उसे पुनः

44:04.920 --> 44:06.460
चैतन्य कर देता है।

44:06.460 --> 44:08.510
यह सकारात्मक भाव जगाने

44:08.510 --> 44:09.870
में सहायक है।

44:09.870 --> 44:12.150
ध्यान हमें आत्मानुभूति की

44:12.150 --> 44:13.540
दिशा में आगे बढ़ता है।

44:16.620 --> 44:18.120
ध्यान की स्थिति में बने रहे।

49:43.910 --> 49:45.880
मैं स्वयं को एक स्वस्थ,

49:45.880 --> 49:46.800
शांतिप्रिय,

49:46.800 --> 49:49.420
आनंदपूर्ण एवं प्रेम पूर्ण मानव

49:49.420 --> 49:51.460
बनाने का संकल्प लेता हूँ।

49:51.460 --> 49:53.740
अपने प्रत्येक कार्य से मैं

49:53.740 --> 49:55.920
अपने चारों ओर सुख,

49:55.920 --> 49:58.260
समृद्धि एवं शांति व स्नेहपूर्ण

49:58.260 --> 50:00.760
वातावरण बनाने का प्रयत्न करूंगा।

50:00.760 --> 50:04.100
मैं अहं-केंद्रित जीवन के

50:04.100 --> 50:07.880
स्थान पर योग्य व विवेकपूर्ण

50:07.880 --> 50:09.430
जीवन जीते हुए,

50:09.430 --> 50:10.060
विश्व,

50:10.060 --> 50:13.350
बंधुत्व एवं एकत्व के भाव के साथ

50:13.350 --> 50:15.430
पूरे विश्व को स्वयं में समाहित

50:15.430 --> 50:17.950
करने का पूर्ण पुरुषार्थ करूँगा।

50:17.950 --> 50:20.280
मैं वसुधैव कुटुम् बकम

50:20.280 --> 50:21.170
एमसह,

50:21.170 --> 50:23.200
अस्तित्व के सिद्धांत के प्रति

50:23.200 --> 50:25.290
पूर्ण आस्था रखते हुए,

50:25.290 --> 50:28.630
सबके प्रति क्रतज्यभाव से आत्मत

50:28.630 --> 50:30.595
व्यवहार व आचरण करूँगा।

50:30.595 --> 50:33.670
मैं यहाँ उपस्थित हर व्यक्ति से

50:33.670 --> 50:36.250
एकात्म होने का संकल्प लेता हूँ।

50:51.339 --> 50:57.172
सर्वे भवन्तु सुखिनः

50:57.920 --> 51:04.369
सर्वे सन्तु निरामयाः।

51:05.880 --> 51:10.620
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु

51:13.230 --> 51:20.539
मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्।

51:21.200 --> 51:28.529
मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्।

51:30.019 --> 51:32.058
ॐ

51:32.058 --> 51:33.908
शान्तिः

51:33.908 --> 51:37.528
शान्तिः

51:37.528 --> 51:42.437
शान्तिः ।।
