रिसोर्ससैट -2 ए ने अंतरिक्ष में एक वर्ष पूरा किया

भारत, लगभग 33 लाख वर्ग किलोमीटर का भौगोलिक क्षेत्र, प्राकृतिक संसाधन जैसे वन, फसल भूमि, जल संसाधन, खनिज, आद्रभूमि, बर्फ और हिमनदों आदि से संपन्न है। प्राकृतिक संसाधन और उनके इष्टतम प्रबंधन की उपलब्धता पर सटीक जानकारी सतत विकास और देश की समग्र सामाजिक-आर्थिक समृद्धि के लिए आवश्यक है ।

उपग्रहों की श्रृंखला में रिसोसर्ससैट श्रृंखला ने, अद्वितीय 3 स्तरीय प्रतिबिंबन क्षमता के साथ-साथ उपयोगों के बहुल क्षेत्र में, विशेष रूप से भू और जल संसाधन प्रबंधन के क्षेत्र में अपना 'वर्चस्व' बना दिया है । रिसोर्ससैट की श्रृंखला के पहले उपग्रह, रिसोर्ससैट -1 को वर्ष 2003 में प्रमोचन किया गया था, इसके बाद रिसोर्ससैट -2 का वर्ष 2011 में प्रमोचन किया गया था।

रिसोर्ससैट-2ए को दिसंबर 2016 में प्रमोचन किया गया था। इसमें 5.8 मीटर के स्थानिक विभेदन के साथ उच्च-विभेदन लिस-4 संवेदक और पांच दिवसीय पुनरावर्ती क्षमता है; मध्यम विभेदन 23.5 मीटर के स्थानिक विभेदन के साथ लिस-3 संवेदक और 56 मीटर के स्थानिक विभेदन के साथ स्थूल विभेदन एडब्ल्यूआईएफएस संवेदक है । सभी तीन पेलोड एडब्ल्यूआईएफएस, लिस-3 और लिस-4 संवेदक भारत और आसपास के क्षेत्रों पर बहु-विभेदन डेटा प्राप्त करने के लिए प्रचालित किए जाते हैं। रिसोर्ससैट- 2ए को उपग्रह की रिसोर्ससैट श्रृंखला के बेड़े में जोड़ा गया है ताकि सुसंगत डेटा उत्पादों के निर्माण के लिए उच्च गुणवत्ता वाले प्रतिबिंबों को वितरित किया जा सके।

कक्षा में रिसोर्ससैट -2 और रिसोर्ससैट -2 ए के साथ-साथ, पुनरावर्ती क्षमता में एडब्ल्यूआईएफएस के लिए 2-3 दिन, लिस-3 के लिए 12-13 दिन और लिस -4 के लिए 25-26 दिनों तक सुधार हुआ है। अन्य उपग्रहों के साथ रिसोर्ससैट -2 और 2 ए के संयुक्त पुनरीक्षण विभिन्न अनुप्रयोगों के लिए कई मायनों में उपयोगी होते हैं।

रिसोर्ससैट-2 ए डाटा उत्पाद, अर्थात् रेडियोधर्मी रूप से सुधार किए गए प्रणाली स्तरीय उत्पादों, भू संबंधित भू-आकृति संशोधित और ऊर्ध्व संशोधित उत्पादों को सभी मिशन परीक्षण और अंशांकन / सत्यापन के बाद 06 मई, 2017 से उपयोगकर्ता समुदाय के लिए जारी किए गए थे।

रिसोर्ससैट -2 ए विभिन्न प्रचालन अनुप्रयोगों के लिए उच्च कालिक विभेदन (अधिक बादल मुक्त डेटा) के साथ डेटा की निरंतरता प्रदान करता है, अर्थात्, फसल उत्पादन अनुमान, वन आवरण मापन, भूमि और जल संसाधनों का मापन और मानिटरन, पर्यावरण अनुप्रयोग, ग्रामीण और शहरी विकास योजना, भूगर्भीय अनुप्रयोग, आपदा प्रबंधन सहायता आदि। रिसोर्ससैट-2 व 2ए समूह के परिणामस्वरूप बेहतर पुनरावर्ती का सामान्य लाभ वनस्पति और जल संसाधनों की निगरानी के लिए अत्यंत उपयोगी है।

प्रचालनीय कार्यक्रमों के लिए इनपुट, जैसे कि फसल मॉनिटरन, बागवानी फसलों का आकलन और विकास, आवधिक जल विस्तार के नक्शे, परियोजित जलसंभर विकास कालिक विभेदन के साथ सुनिश्चित किए गए। नई पहल, जैसे कि, फसल बीमा, बहु फसल सूची और निकटतम वास्तविक समय आपदा प्रबंधन सहायता आदि  पूरी तरह से समर्थित हैं।

खरीफ सीजन के दौरान विशिष्ट वार्षिक फसल (120 दिन) की वृद्धि को अब 4 से 5 दृश्यों के बजाय 10 दृश्यों में हासिल किया जा सकता है, इस प्रकार बादल मुक्त डेटा प्राप्त करने और क्षेत्र और उत्पादकता मॉडल के आकलन की सटीकता में सुधार लाने की संभावना में सुधार किया जा सकता है। यह वनस्पति अध्ययन के लिए जैव-खिड़की के बेहतर चयन में मदद करता है। चित्र 1 और 2 में रिसोर्ससैट -2 और 2ए के समूह के बेहतर पुनरीक्षा के फायदे को दर्शाते हैं।

फसल के मापदण्डों और जैवईंधन का मानिटरन ​​फसल वृद्धि में परिवर्तन को जानने के लिए उच्च कालिक विभेदन उपग्रह डेटा की आवश्यकता होती है। विभिन्न विषयों में कालिक कलन विधि के साथ मॉडल को लागू किया जा सकता है । इससे बेहतर फसल अंतर और गौण फसलों की निगरानी में मदद मिलेगी, क्योंकि वे मुख्य रूप से जोतने के लिए फसल कैलेंडर में अतिव्याप्त हैं। वन घटनाक्रमों को अब पाक्षिक अंतरालों से बेहतर जाना जा सकता है। रिसोर्ससैट-2 और 2ए लिस -3 डेटा का उपयोग तेजी से वन निगरानी और वन संसाधन के प्रबंधन और संरक्षण में अवसर प्रदान करता है। यह आंकड़ा जल निकायों के संबंध में विशेष रूप से जल निकायों की निगरानी में मदद करेगा। भारत में जलोढ़ नदियों में बार-बार जमा होने वाली रेत और अवरोधकों के कारण से नदियों को अपना रास्ता बदलना पड़ता है। गंडक नदी बिहार के बाढ़ मैदान में बहती है और पटना के पास गंगा नदी के साथ संगम होता है। 1989 के बाद से लैंडसैट के साथ आईआरएस श्रृंखला के सुसूर संवेदन डेटा गंगा के संगम के निकट गंडक नदी के दिशा को बदलने के दौरान अनूठे अवलोकन प्रदान करता है। चित्र -3, पटना, भारत के पास गंगा और गंडक नदी के बदलती दिशा को दर्शाता है।

लगभग 25 दिनों में लिस-IV डेटा की उपलब्धता कई नए अनुप्रयोगों को संभव बना रही है, अर्थात्, बागान सूची में सुधार आदि; चहुओर-शहरी बागवानी मानचित्रण दूसरा महत्वपूर्ण उपयोग है क्योंकि यह मूल्य में उतार-चढ़ाव / अस्थिरता के मुद्दों के लिए महत्वपूर्ण इनपुट प्रदान करता है।

इन आंकड़ों के साथ, अब प्राकृतिक संसाधन के मानचित्रण में गुणवत्ता में सुधार देखने को मिलेगा क्योंकि अधिक श्रेणियां हो सकती हैं या बेहतर अंतर हो सकता है। प्राकृतिक संसाधन गणना (एनआरसी) परियोजना के अंतर्गत, 1:50,000 पैमाने पर भू उपयोग / भू आवरण परिवर्तन मापन और बंजरभूमि परिवर्तन विश्लेषण (चित्र-4) में रिसोर्ससैट-2 और 2ए लिस-3 डेटा का उपयोग किया गया है।

ग्रामीण क्षेत्रों के संबंध में, एकीकृत जलसंभर प्रबंधन कार्यक्रम (आईडब्ल्यूएमपी) का मनिटरन पहले की तुलना में अधिक बार किया जा सकता है क्योंकि आईडब्ल्यूएमपी जलसंभर में परिवर्तनों पर नज़र रखने के लिए कार्टोसैट -1 डेटा के साथ लिस-IV डेटा का उपयोग किया जाता है। लगभग 8,200 ऐसी परियोजनाओं की निगरानी 5 वर्षों की अवधि में की जानी है। अध्ययन के लिए लगभग 2,000 लिस-IV उत्पादों की आवश्यकता होती है। देश में 8,200 परियोजनाओं की निगरानी की जा रही है और रिसोर्ससैट -2 और 2ए के 2500 दृश्यों को हर साल अध्ययन के लिए खरीदा जा रहा है। आंध्र प्रदेश के प्रकासम जिले में लघुजलसंभर की निगरानी के  उदाहरण को चित्र 5 में दिखाया गया है।

रिसोर्ससैट -2 और 2 ए डेटा की बेहतर उपलब्धता, आपदा मानिटरन के लिए विशेष रूप से गांव स्तर पर बाढ़ के मानचित्रण और निगरानी जैसे घटनाओं और क्षति मूल्यांकन के लिए उपयोगी है ।

रिसोर्ससैट -2 और 2 ए के समूह होने का विशिष्ट लाभ चित्र -6 में दिखाया गया है। यह चित्र रिसोर्ससैट -2 और 2ए के आंकड़ों के संयोजन से उत्पन्न प्रतिबिंब को दर्शाता है और दायां चित्र रायचूर जिला, कर्नाटक के वर्गीकृत कपास की खेती को दर्शाता है। शीर्ष बाएं कोने का डेटा रिसोर्ससैट-2 ए (03/11/2017) और रिसोर्ससैट -2 के द्वारा समान मार्ग पर जनित था। यह चित्र इंगित करता है कि अगर रिसोर्ससैट -2ए वहां नहीं होता, तो हम डेटा के ऊपरी बाएं हिस्से को नहीं देख पाते और अगली संभावना 15/11/2017 (रिसोर्ससैट -2) पर रहती और तब कपास की फसल निकल या कटी हुई होती। इससे आकलन में अनिश्चितता हो सकती थी।

बहु-कालिक 55मी स्थानिक विभेदन उपग्रह डेटा का उपयोग करते हुए राष्ट्रीय भू उपयोग / भू आवरण मापन, वर्ष 2004-05 में शुरू किया गया और आकलन के 13 वार्षिक चक्र आकलन 2016-2017 तक रिसोर्ससैट -2 और 2ए उपग्रह डेटा (चित्र- 7) का उपयोग करते हुए पूरे किए गए। यह भू उपयोग और भू आवरण दशकों के परिवर्तनों का विश्लेषण करने और बेहतर प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन के लिए जमीनी स्तर की प्रक्रियाओं में सुधार करने के लिए अद्वितीय क्षमता प्रदान करता है।

इस प्रकार, रिसोर्ससैट -2 और 2ए ने देश में सुदूर संवेदन प्रौद्योगिकी के बेहतर उपयोग की दिशा में नए आयाम जोड़ता है।

 

संशोधित पुनरीक्षण वनस्पति की वृद्धि को देखने में मदद करता है (मार्च 2017)

चित्र-1: संशोधित पुनरीक्षण वनस्पति की वृद्धि को देखने में मदद करता है (मार्च 2017)

 

खरीफ के दौरान बादल मुक्त डेटा प्राप्त करने की संभावना में सुधार (अगस्त 2017)

चित्र-2: खरीफ के दौरान बादल मुक्त डेटा प्राप्त करने की संभावना में सुधार (अगस्त 2017)

 

 गंगा और गंडक नदी की दिशा में वार्षिक परिवर्तन

चित्र-3: गंगा और गंडक नदी की दिशा में वार्षिक परिवर्तन

 

सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए बंजर भूमि, चरंका सोलर पार्क राधानपुर, गुजरात राज्य

चित्र-4: सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए बंजर भूमि, चरंका सोलर पार्क राधानपुर, गुजरात राज्य

 

 उपग्रह डेटा का उपयोग कर लघुजलसंभर मॉनिटरन

चित्र-5: उपग्रह डेटा का उपयोग कर लघुजलसंभर मॉनिटरन

 

रिसोर्ससैट -2 और 2ए लिस III का एफसीसी और रायचूर जिला, कर्नाटक में कपास क्षेत्र का वर्गीकृत चित्र (छवि सौजन्य: एमएनसीएफसी)

चित्र-6: रिसोर्ससैट -2 और 2ए लिस III का एफसीसी और रायचूर जिला, कर्नाटक में कपास क्षेत्र का वर्गीकृत चित्र (छवि सौजन्य: एमएनसीएफसी)
 

 

1:250,000 पैमाने पर राष्ट्रीय भू उपयोग / भू आवरण मापन

चित्र-7: 1:250,000 पैमाने पर राष्ट्रीय भू उपयोग / भू आवरण मापन