भारत में आरंभिक उपग्रह आधारित दिशा निदेर्शन सेवाओं की दिशा में एक कदम-गगन एवं आईआरएनएसएस

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) तथा भारतीय विमानपत्‍तन प्राधिकरण (एएआई) ने भारतीय वायु क्षेत्र हेतु जीपीएस  समर्थित भू संवर्धन दिशा निर्देशन-गगन परियोजना को उपग्रह आधारित संवर्धन तंत्र (एसबीएएस) के रूप में लागू किया है। भारत में नागरिक विमानन के क्षेत्र में जीवन सुरक्षा के लिए गगन परियोजना के तहत उपग्रह आधारित संवर्धन तंत्र की स्‍थापना, विस्तार तथा प्रमाणीकरण के लक्ष्य को सफलतापूर्वक प्राप्त कर लिया गया है। इस तंत्र को अमेरिका के वास (डब्‍ल्‍यूएएएस), यूरोप के ईग्‍नोस (ईजीएनओएस), तथा जापान के एमसास (एमएसएएस) आदि‍ के साथ आदल बदल कर प्रयोग किया जा सकता है। गगन के पदचिह्न अफ्रीका से आस्‍ट्रेलिया तक व्‍याप्‍त हैं तथा इस क्षेत्र में अबाधित सेवा के लिए इसमें संभावनाएं मौजूद हैं। गगन द्वारा हमें इसके सेवा क्षेत्र के अंदर उड़ान मार्ग से लेकर सभी योग्‍य हवाई अड्डों पर अभिगम व उड़ान के सभी चरणों के लिए आवश्‍यक परिशुद्धता, उपलब्‍धता तथा अखंडता उपलब्‍ध हो सकती है। गगन संबंधी नीतभार जीसैट-8 तथा जीसैट-10 उपग्रहों के माध्‍यम से काम कर रहे हैं। गगन का तीसरा नीतभार इसी वर्ष प्रमोचित होने वाले  जीसैट-15 पर लगाया जाएगा।

नागरविमानन महानिदेशक ने दिसम्‍बर 30, 2013 से गगन को उड़ान मार्ग के दौरान प्रचालनों (आरएनपी 0.1) के लिए तथा अप्रैल 21, 2015 से परिशुद्ध अभिगम सेवाओं (एपीवी 1) के लिए प्रमाणित कर दिया है। मई 29, 2015 से प्रमाणित गगन संकेतों का प्रसारण किया जा रहा है। गगन भूमध्‍यरेखीय क्षेत्र में सेवाएं उपलब्‍ध कराने वाला विश्‍व का पहला एसपीएएस तंत्र बन गया है। इसरो द्वारा गगन संबंधित आयनमंडलीय एर्ल्‍गोथिम का विकास किया गया है, जिसे इसरो गिव मॉडल-बहुस्‍तरीय आंकड़ा संलयन (आईजीएम-एमएलडीएफ) के नाम से भी जाना जाता है। गगन तंत्र पर यह एर्ल्‍गोथिम काम कर रहा है। भारत अब परिशुद्ध अभिगम क्षमताओं से युक्‍त विश्‍व का तीसरा देश बन चुका है।

हालांकि गगन को मूल रूप से वैमानिकी के वास्‍ते तैयार किया गया है लेकिन, यह तंत्र सुविज्ञ परिवहन, समुद्रीमार्गों, राजमार्गों, रेलमार्गों, सर्वेक्षणों, भूगणित, सुरक्षा एजेंसियों, दूरसंचार उद्योगों, निजी प्रयोक्‍ताओं को स्थिति संबंधित जानकारी आदि जैसे वैमानिकी से इतर विविध प्रयोक्ता समुदायों के लिए भी लाभप्रद सिद्ध होगा। 

भारतीय क्षेत्र में प्रयोक्‍ताओं को स्थिति निर्धारण,  दिशा निर्देशन तथा काल मापन सेवाएं उपलब्‍ध कराने के लिए के लिए एक भारतीय क्षेत्रीय दिशा निर्देशन उपग्रह तंत्र अर्थात् आईआरएनएसएस हेतु एक स्‍वतंत्र उपग्रह आधारित दिशा निर्देशन तंत्र के डिजाइन व विकास की दिशा में यह इसरो का एक प्रयास है। इस तंत्र को सात अंतरिक्षयानों के समूह तथा विशाल भू तंत्रों के नेटवर्क द्वारा प्रचालन के लिए अभिकल्पित किया गया है। पहले तीन उपग्रहों (आईआरएनएसएस-1ए, 1बी तथा 1सी) को 2013-2014 के दौरान प्रमोचित किया गया था।

आईआरएनएसएस समूह के चौथे उपग्रह आईआरएनएसएस-1डी को मार्च 28, 2015 को पीएसएलवी-सी27 द्वारा सफलतापूर्वक प्रमोचित किया गया था। अंतरिक्षयान पर आरंभिक परीक्षणों को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है तथा वह अब आईआरएनएसएस के अंतरिक्ष घटक परिवार के साथ जुड़ चुका है। चौथे उपग्रह के जुड़ जाने पर न्‍यूनतम उपग्रह आवश्‍यकता पूरी हो चुकी है तथा पहली बार भारतीय उपग्रह आधारित दिशा निर्देशन तंत्र के प्रयोग द्वारा एक स्‍वतंत्र स्थिति निर्धारण समाधान का प्रदर्शन किया गया है। भू-स्थिर पृथ्‍वी कक्षा (जीईओ) तथा भू-तुल्‍यकाली कक्षा (जीएसओ) संरूप में अभिकल्पित चार उपग्रहों के समूह से रोज 20 घंटे, 15 मीटर से भी बेहतर स्थिति परिशुद्धता प्राप्त हो सकी है।

इसरो द्वारा "आईआरएनएसएस सिग्‍नल इन स्‍पेस इन्‍टरफेस कंट्रोल डॉक्‍यूमेंट फॉर स्‍टैंडर्ड पोजि़शनिंग सर्विस वर्शन 1.0 " जारी कर दिया गया है। यह प्रलेख प्रयोक्‍ता रिसीवर निर्माताओं को विस्‍तार से सभी ज़रूरी सूचनाएं प्रदान करता है। इस प्रलेख को  http://irnss.isro.gov.in पर डाउन लोड किया जा सकता है।

गगन जहां भारतीय वायुक्षेत्र में दिशानिर्देशन को पुनःपरिभाषित करेगा, वहीं आईआरएनएसएस भारतीय क्षेत्र में एक स्वतंत्र एवं आत्मनिर्भर उपग्रह आधारित दिशानिर्देशन सेवा उपलब्ध कराएगा।