डॉ. विक्रम साराभाई (1963-1971)

 

उपलब्धियाँ:

 

डॉ. साराभाई को भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक माना जाता है; वे महान संस्थान निर्माता थे और उन्होंने विविध क्षेत्रों में अनेक संस्थाओं की स्थापना की या स्थापना में मदद की। अहमदाबाद में भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला की स्थापना में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई: केम्ब्रिज से 1947 में आज़ाद भारत में वापसी के बाद, उन्होंने अपने परिवार और मित्रों द्वारा नियंत्रित धर्मार्थ न्यासों को अपने निवास के पास अहमदाबाद में अनुसंधान संस्थान को धन देने के लिए राज़ी किया। इस प्रकार 11 नवंबर, 1947 को अहमदाबाद में विक्रम साराभाई ने भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल) की स्थापना की। उस समय उनकी उम्र केवल 28 वर्ष थी। साराभाई संस्थानों के निर्माता और संवर्धक थे और पीआरएल इस दिशा में पहला क़दम था। विक्रम साराभाई ने 1966-1971 तक पीआरएल की सेवा की।

 

वे परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष भी थे। वे अहमदाबाद में स्थित अन्य उद्योगपतियों के साथ मिल कर इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट, अहमदाबाद की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

 

डॉ. साराभाई द्वारा स्थापित कतिपय सुविख्यात संस्थान हैं:

 

  1. भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल), अहमदाबाद
  2. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट (आईआईएम), अहमदाबाद
  3. कम्यूनिटी साइंस सेंटर, अहमदाबाद
  4. दर्पण अकाडेमी फ़ॉर परफ़ार्मिंग आर्ट्स, अहमदाबाद (अपनी पत्नी के साथ मिल कर)
  5. विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र, तिरुवनंतपुरम
  6. स्पेस अप्लीकेशन्स सेंटर, अहमदाबाद (यह संस्थान साराभाई द्वारा स्थापित छह संस्थानों/केंद्रों के विलय के बाद अस्तित्व में आया)
  7. फ़ास्टर ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (एफ़बीटीआर), कल्पकम
  8. वेरिएबल एनर्जी साइक्लोट्रॉन प्रॉजेक्ट, कोलकाता
  9. इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड(ईसीआईएल), हैदराबाद
  10. यूरेनियम कार्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड(यूसीआईएल),जादूगुडा, बिहार

 

 

भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम

 

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की स्थापना उनकी महान उपलब्धियों में एक थी। रूसी स्पुतनिक के प्रमोचन के बाद उन्होंने भारत जैसे विकासशील देश के लिए अंतरिक्ष कार्यक्रम के महत्व के बारे में सरकार को राज़ी किया। डॉ. साराभाई ने अपने उद्धरण में अंतरिक्ष कार्यक्रम के महत्व पर ज़ोर दिया:

 

"ऐसे कुछ लोग हैं जो विकासशील राष्ट्रों में अंतरिक्ष गतिविधियों की प्रासंगिकता पर सवाल उठाते हैं। हमारे सामने उद्देश्य की कोई अस्पष्टता नहीं है। हम चंद्रमा या ग्रहों की गवेषणा या मानव सहित अंतरिक्ष-उड़ानों में आर्थिक रूप से उन्नत राष्ट्रों के साथ प्रतिस्पर्धा की कोई कल्पना नहीं कर रहें हैं।" "लेकिन हम आश्वस्त हैं कि अगर हमें राष्ट्रीय स्तर पर, और राष्ट्रों के समुदाय में कोई सार्थक भूमिका निभानी है, तो हमें मानव और समाज की वास्तविक समस्याओं के लिए उन्नत प्रौद्योगिकियों को लागू करने में किसी से पीछे नहीं रहना चाहिए।"

 

भारतीय परमाणु विज्ञान कार्यक्रम के जनक के रूप में व्यापक रूप से मान्यता प्राप्त डॉ. होमी जहाँगीर भाभा ने भारत में प्रथम राकेट प्रमोचन केंद्र की स्थापना में डॉ.साराभाई का समर्थन किया। यह केंद्र मुख्यतः भूमध्यरेखा से उसकी निकटता की दृष्टि से, अरब महासागर के तट पर, तिरुवनंतपुरम के निकट थुम्बा में स्थापित किया गया। अवसंरचना, कार्मिक, संचार लिंक, और प्रमोचन मंचों की स्थापना के उल्लेखनीय प्रयासों के बाद, 21 नवंबर, 1963 को सोडियम वाष्प नीतभार सहित उद्घाटन उड़ान प्रमोचित की गयी।

 

1966 में नासा के साथ डॉ.साराभाई के संवाद के परिणामस्वरूप, जुलाई 1975-जुलाई 1976 के दौरान उपग्रह अनुदेशात्मक दूरदर्शन परीक्षण (एसआईटीई) का प्रमोचन किया गया (जब डॉ. साराभाई का स्वर्गवास हो चुका था)।

 

डॉ. साराभाई ने भारतीय उपग्रहों के संविरचन और प्रमोचन के लिए परियोजना प्रारंभ की। परिणामस्वरूप, प्रथम भारतीय उपग्रह, आर्यभट्ट, रूसी कॉस्मोड्रोम से 1975 में कक्षा में स्थापित किया गया।

 

डॉ. साराभाई विज्ञान की शिक्षा में अत्यधिक दिलचस्पी रखते थे और 1966 में सामुदायिक विज्ञान केंद्र की स्थापना अहमदाबाद में की। आज यह केंद्र विक्रम साराभाई सामुदायिक विज्ञान केंद्र कहलाता है।

 
 
 

 

 

डॉ. विक्रम साराभाई का जन्म पश्चिमी भारत में गुजरात राज्य के अहमदाबाद शहर में 12 अगस्त 1919 को हुआ था। साराभाई परिवार एक महत्वपूर्ण और संपन्न जैन व्यापारी परिवार था। उनके पिता अंबालाल साराभाई एक संपन्न उद्योगपति थे तथा गुजरात में कई मिलों के स्वामी थे। विक्रम साराभाई, अंबालाल और सरला देवी के आठ बच्चों में से एक थे।

इंटरमीडिएट विज्ञान की परीक्षा पास करने के बाद साराभाई ने अहमदाबाद में गुजरात कॉलेज से मेट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की।

उसके बाद वे इंग्लैंड चले गए और केम्ब्रिज विश्वविद्यालय के सेंट जॉन कॉलेज में भर्ती हुए। उन्होंने केम्ब्रिज से 1940 में प्राकृतिक विज्ञान में ट्राइपॉस हासिल किया।

द्वितीय विश्व युद्ध के बढ़ने के साथ, साराभाई भारत लौटे और बेंगलौर के भारतीय विज्ञान संस्थान में भर्ती हुए तथा नोबेल पुरस्कार विजेता, सर सी. वी. रामन के मार्गदर्शन में ब्रह्मांडीय किरणों में अनुसंधान शुरू किया।

युद्ध के बाद 1945 में वे केम्ब्रिज लौटे और 1947 में उन्हें उष्णकटिबंधीय अक्षांश में कॉस्मिक किरणों की खोज शीर्षक वाले अपने शोध पर पी.एच.डी की डिग्री से सम्मानित किया गया।

30 दिसंबर,1971 को कोवलम, तिरुवनंतपुरम, केरल में डॉ. विक्रम साराभाई का निधन हो गया।

 

डॉ. विक्रम साराभाई

 
पुरस्कार
शांतिस्वरूप भटनागर पुरस्कार (1962)
पद्मभूषण (1966)
पद्म विभूषण, मरणोपरांत (1972)
महत्वपूर्ण पद
भौतिक-विज्ञान अनुभाग, भारतीय विज्ञान कांग्रेस के अध्यक्ष (1962)
आई.ए.ई.ए., वेरिना के महा सम्मलेनाध्यक्ष (1970)
उपाध्यक्ष, 'परमाणु ऊर्जा का शांतिपूर्ण उपयोग' पर चौथा संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (1971)
सम्मान

रॉकेटों के लिए ठोस और द्रव नोदकों में विशेषज्ञता रखने वाले अनुसंधान संस्थान, विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (वीएसएससी) का नामकरण उनकी स्मृति में किया गया, जो केरल राज्य की राजधानी तिरूवनंतपुरम में स्थित है।

1974 में, सिडनी में अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ ने निर्णय लिया कि सी ऑफ़ सेरिनिटी में स्थित चंद्रमा क्रेटर बेसेल (बीईएसएसईएल) डॉ. साराभाई क्रेटर के रूप में जाना जाएगा।