एस्ट्रोसैट

एस्ट्रोसैट

नई सहस्राब्दी में, अंतरराष्ट्रीय खगोल विज्ञान समुदाय पहले कभी नहीं किया ऐसे शक्तिशाली दूरबीनों को खगोल विज्ञान के ज्ञान की सीमाओं को लांघने के लिए कई अंतरिक्ष मिशन के प्रमोचन की योजना बना रहा है।

भारतीय संदर्भ में, विभिन्न संस्थाओं और विश्वविद्यालयों से करीब पचास भारतीय खगोलविदों ने मुख्य रूप से तारकीय वस्तुओं के अध्ययन के लिए समर्पित खगोल विज्ञान मिशन को इसरो द्वारा विकसित और प्रमोचन करने पर विचार-विमर्श करने के लिए 1996 के दौरान मुलाकात की। इसरो द्वारा कार्य समूहों को विभिन्न संभावित परिदृश्यों का अध्ययन करने के लिए गठित किया गया । समुदाय ने 2000 में इसरो के लिए विज्ञान  योजना प्रस्तुत की ।  दस्तावेज के आधार पर, 2002 में इसरो ने मिशन के लिए निर्धारित किए गए चार जटिल एक्स-रे पेलोड के सेट को विकसित करने का फैसला लिया । आगे की चर्चा के बाद मिशन में अल्ट्रा वायलेट इमेजिंग टेलीस्कोप भी शामिल किया गया था।

यह महत्वाकांक्षी भारतीय मिशन भारतीय वैज्ञानिकों को विद्युतचुबंकीय उपयोग के साथ सफेद ड्राफ्स, न्यूट्रॉन तारे और ब्लैक होल जैसे असाधारण वस्तुओं का पता लगाने के लिए क्षमता प्रदान करता है और नए रोमांचक खोजों के लिए संभावित नई दिशा उपलब्ध कराने की उम्मीद थी । इसके अलावा, यह परियोजना खगोल विज्ञान अनुसंधान और बृहत डेटा के विश्लेषण में युवा वैज्ञानिकों की नई पीढ़ी को प्रशिक्षित करने के लिए मददगार होगा।

इसलिए, विस्तृत जांच शुरू की गई जो वैज्ञानिक उद्देश्यों, डिजाइन विनिर्देशों, विज्ञान पेलोड के विकास, अंतरिक्ष यान मुख्य बस तत्वों, लांच, डेटा अभिग्रहण, वैज्ञानिकों द्वारा डेटा प्रबंधन और उपयोग, बजट, मानव संसाधन को देखेगी और समय निर्धारण करेगी। इस अध्ययन के आधार पर, भारत सरकार ने 2004 में एस्ट्रोसैट बहु-तरंग दैर्घ्य खगोलीय वेधशाला मिशन के लिए इसरो के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी ।