एस्ट्रोडसैट ने ब्लैककहोल प्रणाली की उच्चं ऊर्जा एक्स.–किरण परिवर्तनीयता का प्रेक्षण किया

भारत के प्रथम समर्पित उपग्रह, एस्‍ट्रोसैट जिसे 28 सितंबर, 2015 को इसरो द्वारा प्रमोचित किया गया था, ने ब्‍लैक होल प्रणाली से उच्‍च ऊर्जा (विशेषकर >20keV) एक्‍स-किरण उत्‍सर्जन की सबसे पहले त्‍वरित परिवर्तनीयता का प्रेक्षण किया।

ब्‍लैक होल प्रणालियों में, नियमित तौर पर भार अनावरित हो जाता है और ब्‍लैक होल के चारों ओर तश्‍तरी का आकार बनाते हुए ब्‍लैक होल की ओर गिर जाता है। इस तश्‍तरी का तापमान 10 मिलियन डिग्री से भी ज्‍यादा होता है अत: प्रणाली से एक्‍स-किरणें उत्‍सर्जित होती हैं। इन प्रणालियों से निकलने वाली कुल ऊर्जा अक्‍सर सूर्य की ऊर्जा से 10 हजार गुणा ज्‍यादा होती है। फिर भी ये प्रणालियां एक सेकेंड से भी कम समय सीमा में बहुत तेजी से परिवर्तित होती हैं।

खगोलविद, जी.आर.एस. 1915+105 नामक रहस्‍यमय ब्‍लैक होल प्रणाली से हमेशा भ्रमित हो जाते हैं। यह कई विभिन्‍न प्रकार के व्‍यवहार प्रदर्शित करता है और कभी-कभी इसके एक्‍स-किरण उत्‍सर्जन कुछ सौ मिली सेकेंड की समय-सीमा पर आवधिक रूप से दोलित होता है (अत: इन दोलनों को स्‍थैतिक अवधि दोलनों के नाम से जाना जाता है)। खगोलविदों का विश्‍वास है कि ये दोलन हो सकते हैं क्‍योंकि ब्‍लैक होल के चारों ओर तश्‍तरी का आंतरिक हिस्‍सा प्रसंस्‍कृ‍त होता है (अर्थात डगमगाता है) क्‍योंकि घूमता हुआ ब्‍लैक होल इसके चारों अंतरिक्ष काल फैब्रिक को खींच लेता है जैसा कि आइन्‍सटीन के सापे‍क्षता के सामान्‍य सिद्धांत द्वारा अनुमानित है।

जबकि इन दोलनों का अमरीकी उपग्रह रोस्‍सी एक्‍स-किरण कालन परीक्षण का प्रयोग करते हुए निम्‍न ऊर्जा एक्‍स-किरण में पूर्व में जानकारी प्राप्‍त की गई है तथा अध्‍ययन किया गया है, अब इन्‍हें इसरो के अंतरिक्ष मिशन, एस्‍ट्रोसैट के बृहत क्षेत्र एक्‍स-किरण अनुपातिक काउंटर (एल.ए.एक्‍स.पी.सी.) द्वारा उच्‍च ऊर्जा एक्‍स-किरणों में संसूचित एवं विशिष्‍टीकृत किया गया है। उच्‍च ऊर्जा एक्‍स-किरणों में घटना को प्रेक्षित करना अति कठिन है चूंकि उच्‍च ऊर्जा फोटोन के  निम्‍न ऊर्जा की अपेक्षा ब्‍लैक होल के नजदीक उत्‍सर्जित होने की संभावना है। अति उच्‍च संवेदनशील उपकरण, एल.ए.एक्‍स.पी.सी. ब्‍लैक होल के चारों ओर चक्‍कर लगाते हुए गैस भंवर की ज्‍यामिति एवं गतिक व्‍यवहार के सीधे संकेत मुहैया कराते हुए उच्‍च एवं निम्‍न ऊर्जा एक्‍स-किरणों के बीच (जो दसों मिली-सेकेंडों के क्रम में है) आगमन समय भेद का भी मापन करता है।

यह सब स्रोत के एस्‍ट्रोसैट प्रेक्षण के मात्र नौ कक्षाओं या कुछ घंटों में प्राप्‍त किया गया था और वर्तमान में कोई अन्‍य वेधशाला इन परिणामों को प्राप्‍त करने में सक्षम नहीं है। एस्‍ट्रोसैट पर उपकरणों के सावधानीपूर्वक निष्‍पादन समापन के पश्‍चात अब भारतीय वैज्ञानिक ब्रह्माण्‍ड के रहस्‍यों को उजागर करने हेतु एस्‍ट्रोसैट का प्रयोग कर रहे हैं और यह परिणाम ऐसे बड़े अन्‍वेषणों की शुरूआत है जिसकी एस्‍ट्रोसैट द्वारा किए जाने की संभावना है। यह भारतीय खगोलविज्ञान का नया युग है जिसमें एस्‍ट्रोसैट अग्रणी समर्पित खगोलविज्ञानीय उपग्रह है।

यह परिणाम अंतर-विश्‍वविद्यालय खगोलविज्ञान एवं तारा भौतिकी केंद्र (आई.यू.सी.ए.ए.), मुंबई विश्‍वविद्यालय एवं रमन अनुसंधान संस्‍थान (आर.आर.आई.) से खगो‍लविदों के साथ-साथ टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्‍थान (टी.आई.एफ.आर.) से प्रोफे. जे.एस. यादव की अगुवाई में एवं अन्‍य वैज्ञानिकों द्वारा रिपोर्ट की किए गए हैं। इनकी रिपोर्ट ताराभौतिकी जर्नल में प्रकाशित की जाएगी।

एल.ए.एक्‍स.पी.सी. उपकरण टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्‍थान (टी.आई.एफ.आर.), मुंबई में स्‍वदेशी रूप से वि‍कसित किया गया था।