निसार डेटा से प्राप्त 100 मीटर विभेदन पर मृदा नमी उत्पाद
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14 फरवरी, 2026

नासा-इसरो सिंथेटिक एपर्चर रडार (निसार) एस और एल बैंड में भारतीय भूभाग का सुनियोजितप्रतिबिंबन कर रहा है ताकि उच्च विभेदन तथा विस्तृत क्षेत्र का डेटा 12 दिनों की पुनरावृत्ति के साथ प्राप्त किया जा सके। इस डेटा का प्रभावी ढंग से उपयोग 100 मीटर के उच्च विभेदन पर मृदा-आर्द्रता उत्पाद तैयार करने में किया गया है। मृदा-आर्द्रता,फसल स्वास्थ्य, सिंचाई की आवश्यकता और सूखे के जोखिम के प्रमुख संकेतक के रूप मेंभारत की कृषि एवं जल प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

एस-बैंड और एल-बैंड डेटा दोनों का उपयोग करके प्रदर्शित किए गए मृदा-आर्द्रता उत्पाद, भारत के विविध कृषि-जलवायु क्षेत्रों अर्थात सिंचित मैदानों और वर्षा आधारित खेतों से लेकर अर्ध-शुष्क और उच्च वर्षा वाले क्षेत्रों तक सुसंगत अनुमान प्रदान करते हैं। अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (सैक-इसरो) में विकसित भौतिकी-आधारित मृदा-आर्द्रता पुनर्प्राप्ति एल्गोरिदम, वैज्ञानिक मजबूती, विश्वसनीयता और प्रचालन सटीकता सुनिश्चित करता है।

प्रत्येक 12 दिनों में दो प्रेक्षण प्रदान करने की क्षमता के साथ, निसार मृदा-आर्द्रता गतिशीलता का लगभग वास्तविक समय में निगरानी करने में सक्षम बनाता है। इस निरंतर निगरानी के द्वारा सिंचाई योजना, सूखा संबंधी तैयारी, कृषि-मौसम विज्ञान संबंधी परामर्श और क्षेत्रीय जल संसाधन प्रबंधन में जिलों और कृषि समुदायों के लिए प्रासंगिक स्तर पर सहयोग प्राप्त होता है।

राष्ट्रीय स्तर पर किए जाने वाले कार्यों में सहयोग देने के लिए, राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (आईएमजीईओएस/एनआरएससी) में हर 12 दिन में दो प्रेक्षणों के साथ 100 मीटर वाला स्तर-4 के प्रचालनात्मकमृदा आर्द्रता उत्पाद व्यवस्थित रूप से तैयार करने के पश्चात भूनिधि पोर्टल के माध्यम से प्रसारित किए जाएंगे, जिससे देश भर के किसानों, योजनाकारों, शोधकर्ताओं, सरकारी एजेंसियों और गैर-सरकारी संस्थाओं (एनजीई) तक इनकी निर्बाध पहुंच सुनिश्चित होगी।

यहां दिखाए गए परिणाम भारत के विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में अनेक पूर्ण-प्रमार्ज 100 मीटर एल और एस-बैंड मृदा आर्द्रता उत्पादों को दर्शाते हैं, जो राष्ट्रीय कृषि और जल-विज्ञान निगरानी के लिए उपयुक्त बड़े पैमाने के अनुरूप आर्द्रता के पैटर्न को प्रदर्शित करते हैं।

  • • पश्चिमी भारत – अर्ध-शुष्क, नमी की कमी वाली परिस्थितियाँ (चित्र-1)
  • • उत्तरी भारत, जिसमें सिंधु-गंगा के मैदान भी शामिल हैं – सिंचाई के कारण परिवर्तनशीलता (चित्र-2 और 3)
  • • मध्य भारत – वर्षा आधारित कृषि क्षेत्र (चित्र-4)

ये परिणाम सामूहिक रूप से राष्ट्रव्यापी अनुप्रयोगों के लिए निसार के मृदा नमी उत्पादों की प्रचालनात्मक तत्परता, विस्तारशीलता और विश्वसनीयता की पुष्टि करते हैं।

ये परिणाम से विश्वसनीय प्रचालनात्मक मृदा आर्द्रता पुनर्प्राप्ति के लिए निसार की दो आवृत्तियों, एल-बैंड और एस-बैंड, की पूरक शक्तियों पर भी प्रकाश डालते है। एल-बैंड वनस्पति और फसल आवरण के नीचे अधिक गहराई तक प्रवेश और बेहतर संवेदनशीलता प्रदान करता है, जबकि एस-बैंड बेहतर सतह संवेदनशीलता और अधिक सूक्ष्म स्थानिक विवरण प्रदान करता है। ये लाभ विभिन्न कृषि परिदृश्यों में अधिक मजबूत संयुक्त दोहरी आवृत्ति आधारित उत्पादों के लिए मार्ग प्रशस्त करते हैं।

इन प्रारंभिक उत्पादों का भारत भर में विभिन्न प्रकार की मृदा संरचनाओं, वर्षा पैटर्न और फसल प्रणालियों का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रमुख मृदा आर्द्रता अंशांकन/सत्यापन स्थलों पर सुनियोजित मूल्यांकनकिया जा रहा है। सटीकता को परिष्कृत करने और प्रचालनात्मक प्रस्तरण के लिए विश्वास सुनिश्चित करने हेतु स्वस्थाने आर्द्रता नमी संवेदक और केंद्रों का उपयोग करके भू मापनकि जा रहे हैं।

क्षेत्र-स्तरीय मृदा आर्द्रता उत्पादों के लिए अधिक सूक्ष्म विभेदन विकसित करने हेतु आगे के विकास कार्य प्रगति पर हैं ताकि उप-क्षेत्रीय नमी की गतिशीलता को समझा जा सके।

निसार: डेटा-आधारित कृषि के लिए एक राष्ट्रीय संपत्ति

निसार के 100 मीटर वाले लेवल-4 प्रचालनात्मक मृदा आर्द्रता उत्पाद भारत की भू प्रेक्षण क्षमता में महत्वपूर्ण प्रगति का प्रतिनिधित्व करते हैं। अंतरिक्ष से लगातार, उच्च-विभेदन और भौतिक रूप से सुसंगत मृदा आर्द्रता की जानकारी प्रदान करके, निसार किसानों, योजनाकारों, गैर-सरकारी संस्थाओं (एनजीई) और नीति निर्माताओं को सतत कृषि, कुशल सिंचाई और राष्ट्रीय खाद्य एवं जल सुरक्षा के लिए उपयोगी जानकारी प्रदान करता है।

(a) NISAR L-band (HH & HV-polarizations) (b) NISAR S-band HH & HV-polarizations in ascending pass

चित्र 1: पश्चिमी गुजरात के अहमदाबाद में 100 मीटर की गहराई पर मृदा आर्द्रता उत्पाद में(क) निसार एल-बैंड (एचएच और एचवी-ध्रुवीकरण) और (ख) आरोही पारक में निसार एस-बैंड एचएच और एचवी-ध्रुवीकरण का उपयोग

(a) NISAR L-band (HH & HV-polarizations) (b) NISAR S-band HH & HV-polarizations in ascending pass

चित्र 2: उत्तरी भारत में 100 मीटर की गहराई पर प्राप्त मृदा आर्द्रताके उत्पाद, जिसमें सिंधु-गंगा के मैदानी इलाकों को शामिल किया गया है, उसमें (क) निसार एल-बैंड (एचएच और एचवी-ध्रुवीकरण) और (ख) आरोही पारक में निसार एस-बैंड एचएच और एचवी-ध्रुवीकरण का उपयोग

(a) NISAR L-band HH & HV-polarizations (b) NISAR S-band HH & HV-polarizations in ascending pass

चित्र 3: उत्तरी भारत में हरियाणा और नई दिल्ली को कवर करते हुए 100 मीटर की गहराई पर मृदा आर्द्रताके उत्पाद में, (क) निसार एल-बैंड एचएच और एचवी-ध्रुवीकरण (ख) आरोही पारक में निसार एस-बैंड एचएच और एचवी-ध्रुवीकरण का उपयोग

(a) NISAR L-band HH & HV-polarizations (b) NISAR S-band HH & HV-polarizations in ascending pass

चित्र 4: मध्य भारत में 100 मीटर की गहराई पर वन और कृषि भूमि को कवर करते हुए मृदा आर्द्रताके उत्पाद में, (क) निसार एल-बैंड एचएच और एचवी-ध्रुवीकरण (ख) आरोही पारक में निसार एस-बैंड एचएच और एचवी-ध्रुवीकरण का उपयोग