भारत के आदित्य-L1 और यूरोप के प्रोबा-3 पर लगे कोरोनाग्राफों के पहले संयुक्त प्रेक्षण ने उद्गम स्थल के निकट सौर विस्फोटों की गुत्थी सुलझाई
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15 अक्तूबर, 2026

पहली बार, भारत के आदित्य-L1 मिशन और यूरोप के प्रोबा-3 मिशन द्वारा एक ही सौर विस्फोटों के वैज्ञानिक प्रेक्षणों का संयुक्त रूप से विश्लेषण कर उन्हें प्रकाशित किया गया है। भारतीय खगोलभौतिकी संस्थान (IIA), बेंगलुरु के वैज्ञानिकों ने कोरोनल मास इजेक्शन (CMEs) का अध्ययन करने के लिए आदित्य-L1 पर लगे VELC पेलोड और प्रोबा-3 पर लगे ASPIICS पेलोड के प्रेक्षणों को संयोजित किया। उन्होंने सूर्य के अत्यंत निकट के क्षेत्र में इन CMEs के द्रव्यमान, घनत्व और ऊर्जिकी का मापन किया। यह अध्ययन प्रतिष्ठित शोध पत्रिका 'एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स' में प्रकाशित हुआ है।

यह क्यों महत्वपूर्ण है:

CME सूर्य पर होने वाले विशाल विस्फोट हैं, जिनमें भारी मात्रा में चुंबकीकृत प्लाज़्मा अंतरग्रहीय अंतरिक्ष में फेंका जाता है। जब ऐसे विस्फोट पृथ्वी की ओर निर्देशित होते हैं, तो वे पृथ्वी के निकटवर्ती अंतरिक्ष पर्यावरण में विक्षोभ उत्पन्न कर सकते हैं। सूर्य के निकट CME प्राचलों (पैरामीटरों) का मापन उन भौतिक प्रक्रियाओं को समझने के लिए अत्यंत मूल्यवान है, जो CME के गुणों और उनके आगामी विकास को आकार देती हैं। तथापि, सौर डिस्क के अत्यंत निकट CME का प्रेक्षण करना चुनौतीपूर्ण है। पूर्ववर्ती अंतरिक्ष कोरोनाग्राफ इन्हें देखने में केवल आंशिक रूप से सफल रहे और क्षीण CME के प्रारंभिक विकास का अनुसरण नहीं कर सके। परिणामस्वरूप, आंतरिक कोरोना में CME की ऊर्जा गतिज, तापीय और चुंबकीय ऊर्जा के बीच किस प्रकार विभाजित होती है, यह अब तक सीमित रूप से ही ज्ञात रहा है। आदित्य-L1/VELC और प्रोबा-3/ASPIICS के प्रेक्षणों को संयोजित करने से इसे बेहतर ढंग से समझने की संभावना दिखाई देती है।

आदित्य-L1, भारत का पहला समर्पित सौर मिशन, 2 सितंबर 2023 को PSLV-C57 द्वारा प्रक्षेपित किया गया था। अंतरिक्ष यान को 6 जनवरी 2024 को सूर्य-पृथ्वी L1 बिंदु के चारों ओर एक हेलो कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित किया गया। यह विशेष सुविधाजनक स्थिति विभिन्न सौर परिघटनाओं के निर्बाध प्रेक्षण को संभव बनाती है। विजिबल एमिशन लाइन कोरोनोग्राफ (VELC) का विकास IIA, बेंगलुरु ने इसरो के घनिष्ठ सहयोग से किया है। VELC 5303 ऐंग्स्ट्रॉम की हरी कोरोनल लाइन में 1.05 से 1.5 सौर त्रिज्या तक सौर कोरोना के स्पेक्ट्रमिकी प्रेक्षण करता है।

प्रोबा-3, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) का एक मिशन है, जिसे 5 दिसंबर 2024 को श्रीहरिकोटा से PSLV-XL द्वारा प्रक्षेपित किया गया था। यह विश्व का पहला प्रिसिजन फॉर्मेशन-फ्लाइंग मिशन है। इसमें दो अंतरिक्ष यान लगभग 150 मीटर की दूरी पर उड़ान भरते हैं, और एक यान दूसरे पर अपनी छाया डालता है। इससे अंतरिक्ष में एक कृत्रिम सूर्य ग्रहण निर्मित होता है, जिसकी सहायता से प्रोबा-3 पर लगा ASPIICS कोरोनाग्राफ श्वेत प्रकाश में तथा 5303 ऐंग्स्ट्रॉम की हरी कोरोनल लाइन में लगभग 1.1 से 3 सौर त्रिज्या तक कोरोना का प्रतिबिंबन (इमेजिंग) कर पाता है।

साथ मिलकर कार्य:

Tआदित्य-L1 (VELC) और प्रोबा-3 (ASPIICS) पर लगे कोरोनाग्राफों ने सौर कोरोना के लगभग एक ही भाग का दो भिन्न प्रकार के प्रेक्षणों (VELC से स्पेक्ट्रमिकी और ASPIICS से प्रतिबिंबन) द्वारा संयुक्त प्रेक्षण किया। ये संयुक्त प्रेक्षण किसी एक अंतरिक्ष यान के प्रेक्षणों की तुलना में CME के विकास की अधिक गहन जानकारी प्रदान करते हैं। ASPIICS के श्वेत प्रकाश एवं हरी कोरोनल उत्सर्जन लाइन के प्रेक्षण तीक्ष्ण प्रतिबिंब प्रदान करते हैं, जिनसे CME की आकृति, गतिकी और द्रव्यमान का सटीक आकलन संभव होता है। हरी कोरोनल उत्सर्जन रेखा में VELC के स्पेक्ट्रमिकी प्रेक्षण लगभग 20 लाख डिग्री तापमान वाली CME गैस के बारे में जानकारी देते हैं। इससे CME के घनत्व और तापीय ऊर्जा का स्वतंत्र आकलन प्राप्त होता है। दोनों उपकरणों का निचले कोरोना में एक साझा दृश्य क्षेत्र है। शोध दल ने पाया कि जुलाई से दिसंबर 2025 के बीच केवल दो CME, 14 और 16 सितंबर को, VELC और ASPIICS द्वारा एक साथ दर्ज किए गए। दोनों ही मामलों में VELC ने विस्फोटों को उनकी प्रारंभिक अवस्था में ही दर्ज कर लिया, जो दर्शाता है कि

14 सितंबर 2025 (बाएँ) और 16 सितंबर 2025 (दाएँ) को हुए दो कोरोनल मास इजेक्शन (CME) के समन्वित प्रेक्षण।

दोनों उपकरण किस प्रकार एक-दूसरे के पूरक हैं।

चित्र:14 सितंबर 2025 (बाएँ) और 16 सितंबर 2025 (दाएँ) को हुए दो कोरोनल मास इजेक्शन (CME) के समन्वित प्रेक्षण। ऊपरी पैनल आंतरिक कोरोना से CME के गुज़रने के दौरान आदित्य-L1/VELC द्वारा दर्ज कोरोनल उत्सर्जन में वृद्धि को दर्शाते हैं। निचले पैनल प्रोबा-3/ASPIICS द्वारा श्वेत प्रकाश में प्रेक्षित संगत CME को दर्शाते हैं।

मुख्य निष्कर्ष:

  • दो CME, दो भिन्न व्यवहार: 14 सितंबर का CME तीव्र गति (लगभग 645 किमी/सेकंड) वाला था, जबकि 16 सितंबर का CME बहुत धीमा (145 किमी/सेकंड) था। 16 सितंबर के CME का घनत्व बढ़ते ऊँचाई के साथ दूसरे CME की तुलना में अधिक तेज़ी से घटा, जो इसके प्रारंभिक चरण में अधिक प्रबल विस्तार को दर्शाता है।
  • स्वतंत्र जाँचों में सहमति: ASPIICS और VELC से प्राप्त द्रव्यमान और तापीय ऊर्जा के आकलन आपस में अच्छी तरह मेल खाते हैं, यद्यपि दोनों उपकरण भिन्न ज्यामितीय मान्यताओं, भौतिक विचारों और प्रेक्षण प्रकारों का उपयोग करते हैं।
  • भिन्न ऊर्जा विभाजन: 14 सितंबर 2025 के CME में तापीय ऊर्जा कुल ऊर्जा का केवल लगभग 1% थी। 16 सितंबर 2025 के CME में तापीय ऊर्जा तब तक बढ़ती रही जब तक कि वह गतिज ऊर्जा के बराबर नहीं हो गई। आकलित चुंबकीय ऊर्जा गतिज ऊर्जा के तुलनीय या उससे अधिक है।

ये परिणाम आंतरिक कोरोना में CME के द्रव्यमान, घनत्व और ऊर्जिकी को निर्धारित करने में ASPIICS और VELC के सहक्रियात्मक प्रेक्षणों की वैज्ञानिक क्षमता को प्रदर्शित करते हैं, और इस प्रकार CME के प्रारंभिक विकास पर नई प्रेक्षणात्मक सीमाएँ (कंस्ट्रेंट्स) प्रदान करते हैं। यह अध्ययन दर्शाता है कि कोरोना का प्रतिबिंबन करने वाले कोरोनाग्राफ को उसके स्पेक्ट्रम का मापन करने वाले कोरोनाग्राफ के साथ जोड़ने से CME की उत्पत्ति और विकास का अधिक संपूर्ण और परस्पर-सत्यापित चित्र प्राप्त होता है।

यह अध्ययन भारतीय खगोलभौतिकी संस्थान, बेंगलुरु, के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में अन्य यूरोपीय और अमेरिकी सौर भौतिकविदों के साथ मिलकर किया गया। यह कार्य आदित्य-L1 के बढ़ते वैज्ञानिक प्रभाव तथा सौर खगोलभौतिकी और अंतरिक्ष विज्ञान में समन्वित प्रेक्षणों एवं उनसे जुड़े अंतरराष्ट्रीय सहयोग की शक्ति को दर्शाता है।

संदर्भ:

Agarwal, A., Mishra, W., Ramesh, R., et al. (2026). Coordinated coronagraphic observations from Proba-3 and Aditya-L1: Investigating coronal mass ejection energetics in the inner corona. Astronomy & Astrophysics. https://doi.org/10.1051/0004-6361/202661733