आदित्य-एल1 ने सौर प्रज्वालों से पहले सूर्य के प्रारम्भिक चेतावनी संकेतों को अभिग्रहण
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अगस्त 28, 2026
भारत की प्रथम समर्पित सौर वेधशाला, आदित्य-एल1 का उपयोग करने वाले वैज्ञानिकों ने सूर्य के वातावरण में लघु एवं अल्प-कालिक प्रभासन देखे। ये प्रभासन एक विशाल सौर प्रज्वाल के फटने से कुछ घंटे पहले दिखाई देते हैं और ठीक उसी जगह पर इकट्ठा होते हैं जहाँ बाद में प्रज्वाल होता है। द रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी (एमएनआरएएस) की मासिक सूचना में छपी यह रिपोर्ट, आदित्य-एल1 मिशन के तीन नीतभारों से एक साथ लिए गए पराबैंगनी (यूवी) और एक्स-किरण प्रेक्षणों पर आधारित है।
सौर प्रज्वाल क्यों महत्वपूर्ण हैं
सौर प्रज्वाल, सूर्य से निकलने वाले विद्युतचुंबकीय विकिरण के अकस्मात और तेज़ विस्फोट होते हैं। यह माना जाता है कि ये चुंबकीय ऊर्जा के मुक्त होने के कारण से होते हैं। विशाल प्रज्वाल रेडियो संचार में बाधा डाल सकते हैं, नौवहन प्रणाली में गड़बड़ी पैदा कर सकते हैं, उपग्रहों को नुकसान पहुँचा सकते हैं और अंतरिक्ष यात्रियों व अंतरिक्ष यानों के लिए विकिरण का खतरा बढ़ा सकते हैं। इसलिए, अंतरिक्ष मौसम की भविष्यवाणी को बेहतर बनाने और आधुनिक तकनीकी अवसंरचना की सुरक्षा के लिए सौर प्रज्वाल के शुरू होने के कारणों को समझना आवश्यक है।
आदित्य-एल1 इसे कैसे देखता है
सूर्य-पृथ्वी लैग्रेंज बिन्दु 1 (एल1) से निरंतर सूर्य का प्रेक्षण करते हुए आदित्य-एल1 अनेक तरंगदैर्ध्यों पर सौर गतिविधियों का निर्बाध दृश्य प्रदान करता है। पराबैंगनी प्रतिबिंबन सौर दूरबीन (एसयूआईटी) ग्यारह नजदीकी पराबैंगनी (एनयूवी) फिल्टरों में सूर्य को देखता है, जिससे ऊपरी प्रकाशमंडल से लेकर वर्णमंडल तक की विभिन्न परतें दिखाई देती हैं। एनयूवी तरंगदैर्ध्य को पृथ्वी से देखना मुश्किल होता है क्योंकि पृथ्वी का वायुमंडल अधिकांश पराबैंगनी विकिरणों को अवशोषित कर लेता है। एसयूआईटी के साथ दो एक्स-किरण उपकरण भी हैं, सौर निम्न ऊर्जा एक्स-किरण स्पेक्ट्रोमीटर (सोलेक्सस) और उच्च ऊर्जा एल1 परिक्रमण एक्स-किरण स्पेक्ट्रोमीटर (एचईएल1ओएस), जो सौर कोरोना में ऊर्जित प्रक्रियाओं से निकलने वाले एक्स-किरण उत्सर्जन को मापते हैं। इन सभी डेटा को मिलाकर वैज्ञानिक यह अध्ययन करते हैं कि प्रज्वालों के निर्माण के दौरान निम्न सौर वायुमंडल की गतिविधियाँ कोरोना में ऊर्जा मुक्ति की प्रक्रिया से किस प्रकार संबंधित हैं।
शोधकर्ताओं ने क्या पता लगाया
एसयूआईटी के Mg II h फ़िल्टर में अनेक सौर प्रज्वाल घटनाओं का विश्लेषण करते हुए, टीम ने विशाल प्रज्वालों के प्रारंभ होने से पहले सक्रिय क्षेत्रों में अनेक लघु एवं अल्प-कालिक प्रभासन देखे, जिन्हें क्षणिक घटना कहा जाता है। इनमें से कुछ में ऐसे एक्स-किरण संकेत भी दिखे, जिनसे पता चलता है कि इनमें चुंबकीय ऊर्जा का उत्सर्जन होता है।
ये प्रज्वाल-पूर्व क्षणिक घटनाएँ उस जगह के आस-पास केंद्रित थीं, जहां बाद में विशाल प्रज्वाल घटित हुआ। परिणामों से पता चलता है कि बार-बार होने वाले लघु स्तर के ऊर्जा उत्सर्जन से किसी सक्रिय क्षेत्र में चुंबकीय क्षेत्र धीरे-धीरे अस्थिर हो सकता है, जिससे अंततः एक विशाल सौर प्रज्वाल उत्पन्न हो सकता है।
चित्र: 1 नवंबर 2024 को पराबैंगनी प्रतिबिंबन सौर दूरबीन (एसयूआईटी) के Mg II h फ़िल्टर में देखी गई प्रतिनिधिक प्रज्वाल-पूर्व क्षणिक घटनाएँ। लाल रेखाएँ प्रज्वाल-पूर्व चरण में तीन विभिन्न समयों पर चिह्नित क्षणिक प्रभासन को दिखाती हैं।
यह अध्ययन एकल वेधशाला से पराबैंगनी प्रतिबिंबन और एक्स-रे प्रेक्षण का एक साथ उपयोग करते हुए प्रज्वाल-पूर्व गतिविधियों के प्रारम्भिक व्यवस्थित अन्वेषणों में से एक है। ये परिणाम सौर प्रज्वालों को उत्पन्न करने वाली भौतिक प्रक्रियाओं के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हुए वैज्ञानिकों को विश्वसनीय प्रज्वाल भविष्यवाणी करने की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ने में मदद करते हैं, जिससे अंततः अंतरिक्ष मौसम के बेहतर पूर्वानुमान, उपग्रहों, अंतरिक्ष यात्रियों, संचार प्रणालियों और अन्य आवश्यक प्रौद्योगिकियों की सुरक्षा करने में मदद मिलेगी।
मणिपाल प्राकृतिक विज्ञान केंद्र (एमसीएनएस), मणिपाल उच्च शिक्षा अकादमी (एमएएचई) के शोधकर्ताओं और इसरो/डीओएस तथा अन्य शैक्षणिक संस्थानों के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में किया गया यह अध्ययन भारत के प्रमुख सौर मिशन आदित्य-एल1 के बढ़ते वैज्ञानिक प्रभाव को प्रदर्शित करता है।
संदर्भ
आदित्य एच.एन., श्रीजित पदिनहत्तरी, और अन्य (2026)। आदित्य-एल1 के साथ प्रज्वाल-पूर्व विकास का बहु- तरंगदैर्ध्य निदान: सौर वर्णमंडल से कोरोना तक। रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसायटी को मासिक सूचना, stag1416, https://doi.org/10.1093/mnras/stag1416.