सुदूर संवेदन ने कृषि, वानिकी, भूविज्ञान, जल, समुद्र आदि जैसे विभिन्न संसाधनों का मानचित्रण, अध्ययन, मॉनीटरन और प्रबंधन सक्षम किया है। इसके अलावा इसने पर्यावरण का मॉनीटरन सक्षम किया है और एतद्द्वारा संरक्षण में मदद की है। पिछले चार दशकों में यह पृथ्वी के लगभग हर पहलू पर सूचना संग्रहण का प्रमुख साधन बन गया है। हाल के वर्षों में अति उच्च स्थानिक विभेदन उपग्रहों की उपलब्धता से, उपयोग कई गुणा बढ़ गया है। भारत में सुदूर संवेदन को पिछले चार दशकों के दौरान विभिन्न उपयोगों के लिए प्रयुक्त किया गया है और उसने विकास में विशेष योगदान दिया है।
भारत के पास भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह (आईआरएस) श्रृंखला - रिसोर्ससैट, कार्टोसैट, ओशनसैट आदि जैसे स्वयं के उपग्रह हैं, जो विभिन्न परियोजनाओं के कार्यान्वयन के लिए अपेक्षित आँकड़े उपलब्ध कराते हैं। देश में कार्यान्वित प्रमुख परियोजनाओं में शामिल हैं पेय जल अभियान के तहत भू-जल पूर्वेक्षण मानचित्रण, अंतरिक्ष, कृषि-मौसम और भूमि आधारित प्रेक्षण (फसल) का उपयोग करते हुए कृषि उत्पाद का पूर्वानुमान, वन आच्छादन/प्रकार मानचित्रण, घासस्थल मानचित्रण, जैव-विविधता विशिष्टिकरण, हिम और हिमनद अध्ययन, भूमि उपयोग/आवरण मानचित्रण, तटवर्ती अध्ययन, प्रवाल और कच्छ वनस्पति अध्ययन, बंजरभूमि मानचित्रण आदि। असंख्य परियोजनाओं द्वारा जनित सूचना का उपयोग विकास योजना, मॉनिटरन, संरक्षण आदि जैसे अलग-अलग उद्देश्यों के लिए विभिन्न विभागों, उद्योगों और अन्य द्वारा किया गया है।